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सत्यकाम चरित्र-गिरीन्द्र मोहन झा

Girindra Mohan Jha

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जबाला का एक पुत्र महान,

नाम पड़ा जिसका सत्यकाम,

आ गया अब शिक्षा का काल,

पुत्र हेतु माँ चिंतित हुई तत्काल,

माँ शिक्षा प्राप्त करनी है,

जाना है योग्य गुरु के पास,

सुत जाओ ऋषि गौतम के पास,

जाकर करो विद्या का अभ्यास,

माँ उन्होंने पूछा गर पिता का नाम,

क्या कहूँगा, हूँ जिनसे मैं अनजान,

बस इतना कहना, हूँ जबाला का पुत्र सत्यकाम,

वह कुछ और नहीं पूछेंगे तुमसे, इतना रख ध्यान,

गुरुकुल की ओर चले हर्षपूर्वक सत्यकाम,

ऋषि गौतम को शीश नंवाकर किया प्रणाम,

ऋषि ने पूछा, बालक तेरा गोत्र क्या है?

बालक ने कहा, मैं जबाला का पुत्र हूँ सत्यकाम,

ऋषि ने कहा, “ऐसा सत्यवादी कोई ब्राह्मण ही हो सकता है!”

हे बालक ! मैं तुम्हें अवश्य करूंगा शिक्षा का दान,

मैं तुम्हें एक गौ देता हूँ हे मेरे शिष्य सत्यकाम अजस्र,

इसे ले जा, न लौटना, जबतक न हो जाय यह एक सहस्र,

सत्यकाम ने गुरु-आज्ञा हित धेनु लेकर किया प्रस्थान,

एक सहस्र होने तक कई देवों ने भिन्न-भिन्न रूपों में उन्हें दिया ज्ञान,

एक सहस्र गौ ले चले वे गुरु आश्रम,

ऋषि ने कहा, आओ हे वत्स सत्यकाम,

पुत्र अब तुम ब्रह्मज्ञानी हुए, हुए श्रेष्ठ विद्वान,

वत्स अब करो अपने गृह की ओर प्रस्थान,

निज संग करो औरों के जीवन को प्रकाशमान,

उन्होंने अपने गुरु को किया प्रणाम,

अपने घर पहुंचे ब्रह्मज्ञानी सत्यकाम,

एक ओर देखें, तो गुरु के आज्ञा-पालन से उत्तम शिक्षा मिलती है,

दूसरी ओर देखें, प्रकृति-शिक्षक के निकट सच्ची शिक्षा मिलती है ।

 गिरीन्द्र मोहन झा

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