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शिक्षक की पुकार-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

आस लगाए बैठे शिक्षक, पथ पर आँखें बिछाये हैं,
कोई तो पूछे हाल हमारा, दर्द हृदय में समाए हैं।

कल तक थे जो भाग्य-विधाता, आज तिमिर की छाया हैं,
इस दुर्दशा का दोषी कौन, जिसने यह वक्त दिखाया है?

क्यों मौन खड़े हैं अभिभावक, क्यों आज समाज निरुत्तर है?
क्या टूट चुका विश्वास हमसे, जो फैला संकट गहरा है?

कालान्तर में जो पूज्य रहे, इतिहास गवाह है आदर का,
फिर आज तिरस्कार की वेदी पर, क्यों अंत हुआ उस गौरव का?

बात-बात पर हीन भावना, पल-पल मिलता अपमान यहाँ,
क्या ज्ञान का अलख जगाना ही, बन गया हमारा अपराध यहाँ?

छात्रों की उन्नति की खातिर, दिन-रात लहू हम जलाते हैं,
विद्या और संस्कारों का, सुंदर समन्वय महकाते हैं।

पर क्या कभी कोई अभिभावक, सुध लेने हमारी आता है?
पूछने को बच्चों की प्रगति, क्या कोई कदम बढ़ाता है?

मौन तोड़ो ऐ दुनिया वालो, अब और हमें न बिसराओ,
शिक्षक ही राष्ट्र का निर्माता है, इस सत्य को गले लगाओ।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला

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