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सूर्य-चंद्र-गिरीन्द्र मोहन झा

Girindra Mohan Jha

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सूर्य अकेला ही विचरता है,

जगत् का तम वह हरता है,

एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करे,

तो वह संक्रांति कहलाता है,

इसके चारों ओर ग्रह परिक्रमा करते,

यह आकाशगंगा की परिक्रमा करता है,

शास्त्रों में यह आरोग्य और स्वास्थ्य का देवता कहलाता है,

धरती पर यह प्रकाश, ऊर्जा, जीवनी-शक्ति दान करता है,

नियत समय पर उदय-अस्त होता है,

कर्त्तव्य का ससमय निष्ठापूर्वक पालन करता है।

शास्त्रों में चन्द्रमा मन का देवता कहलाता है,

चन्द्रमा धरा को चांदनी -शीतलता प्रदान करता है,

कृष्णपक्ष में यह विलंब से उदित होता है,

शुक्लपक्ष में यह पहले ही उदित होता है,

पूर्णिमा में रात भर शीतलता, चांदनी प्रदान करता है।

हम भी बनें मयंक-मार्तण्ड समान,

स्वयं को बनाते रहें सदा प्रकाशमान,

उच्च आदर्श और यथार्थ की अग्नि में तपकर,

बन जाएं हम इस जगत् में महान,

गर न बन पाए सूर्य-चंद्र सा, बन जाए हम दीपक समान,

चारों ओर प्रकाश फैलाएं, हमारा व्यक्तित्व हो सदा महान।

गिरीन्द्र मोहन झा

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