वर्णमाला-बोध काव्य- धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर
कमल ‘क’ से विकसित हो मन में, पढ़ो निरंतर पल-पल तुम,
खिसके जब खरगोश ‘ख’ से तो, खेलो उसके संग निश्छल तुम।
गगन चूमने की ‘ग’ से मन में पावन आस जगाना,
घर को अपने ‘घ’ से सुंदर, नित अनुराग से रोज सजाना।
‘ङ’ का रिक्त स्थान भरेगा, कठिन परिश्रम का ही फल,
‘च’ से चरखा चला-चला कर, तुम संवारना अपना कल।
छतरी ‘छ’ से तान खड़े हो, जब भी धूप कड़ी आ जाए,
जल की रक्षा ‘ज’ से करना, जल ही जीवन रूप कहाए।
झरना ‘झ’ से झर-झर बहकर, कहता आगे बढ़ते जाना,
‘ञ’ का घर है रिक्त भले ही, पर तुम ज्ञान-शिखर को पाना।
टमाटर ‘ट’ से लाल-लाल खा, उत्तम सेहत रोज बनाना,
ठग से ‘ठ’ से बचकर रहना, कभी न छल-धोखे में आना।
डमरू ‘ड’ से बाजे डम-डम, नाच उठे यह सृष्टि सारी,
ढोलक ‘ढ’ से थाप लगाए, गाए सुरमई तान प्यारी।
‘ण’ कहता मत बैठो खाली, कर्मठ बनकर आगे बढ़ना,
तरबूज ‘त’ से मीठा-मीठा, ग्रीष्म काल में रस से चखना।
थाली में ‘थ’ से जो आए, सादर उसको ग्रहण तुम करना,
दीपक ‘द’ से बनकर जग का, तिमिर-अँधेरा सारा हरना।
धरती माँ की ‘ध’ से सेवा, सच्चे दिल से रोज निभाना,
नदी ‘न’ से अविरल बहकर, जीवन का संदेश सुनाना।
पतंग ‘प’ से नभ में उड़ाना, छूना तुम ऊँचा आसमान,
फल ‘फ’ से खाकर नित बनना, बल बुद्धि में महा बलवान।
बत्तख ‘ब’ से जल में तैरती, मन्द-मन्द उसकी सुंदर चाल,
भालू ‘भ’ से झूम के नाचे, देखो उसका नया कमाल।
मछली ‘म’ से जल की रानी, जीवन का आधार सिखाती,
यज्ञ ‘य’ की पावन खुशबू, अंतस में उल्लास जगाती।
रथ पर ‘र’ से होकर सवार तुम, सत्य मार्ग पर कदम बढ़ाना,
लकड़ी ‘ल’ सी ताकत लेकर, संकट में भी कभी न ढलना।
वन को ‘व’ से हरा-भरा रख, इस सृष्टि का रूप संवारना,
शलगम ‘श’ से खाकर अपनी, काया को ऊर्जस्वित करना।
षट्कोण ‘ष’ के रंगों जैसा, जीवन में नव उल्लास भरो,
सवेरा ‘स’ से नया संदेशा लाए, निर्भय हो पुरुषार्थ करो।
हाथी ‘ह’ सी हिम्मत अपनी, हर बाधा में बनाए रखना,
क्षत्रिय ‘क्ष’ बन कमज़ोरों की, सदा सुरक्षा करते रहना।
त्रिशूल ‘त्र’ से हर संकट और, सब बुराई दूर भगाए,
ज्ञानी ‘ज्ञ’ से बनकर तुम, जग में ज्ञान का दीप जलाए।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया।
09.10.2026

