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रस-वृक्ष (काव्य रूप) :- धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर
हृदय-भूमि पर उगा हुआ है, एक अनूठा रस का वृक्ष,
काव्य-जगत का गौरव है यह, आनंदित करता हर चक्ष।
चार स्तंभ हैं इसके मुख्य, जिससे यह आधार पाता है,
अंग-अंग मिलकर इसके, सुंदर रूप सजाता है।
स्थाई भाव बनी हैं जड़ें, जो अंतस में सोई रहती हैं,
मौसम पाकर अनुकूल सदा, ये नव-अंकुर बन बहती हैं।
विभाव रूपी वो खाद-नदी, जो सोए भाव जगाती है,
अनुभाव की शाखाओं पर, चेष्टाएं खुलकर आती हैं।
संचारी भाव पत्तों जैसे, पल में आते, पल में जाते,
तैंतीस (33) हवा के झोंकों से, पूरे तरु को हर्षाते।
इस अनुपम रस के पादप पर, ग्यारह शाखाएं लहक रहीं,
अपने-अपने सुंदर रंगों से, जीवन-उपवन को महक रहीं:
💝 शृंगार डाल पर बैठे प्रेमी, रति का राग सुनाते हैं,
संयोग-वियोग के झूलों में, नायक-नायिका मुस्काते हैं।
😂 हास्य की टहनी बड़ी अनूठी, हास का फल यह देती है,
अद्भुत वेश और बोली सुनकर, मन की चिंता हर लेती है।
😢 करुण शाखा से सदा टपकती, शोक की अविरल धार यहाँ,
प्रिय के बिछोह या नाश से रोता, व्याकुल है संसार यहाँ।
😡 रौद्र नाम की शाखा पर, क्रोध के अंगारे दहक रहे,
अपमान और अपकार देखकर, प्रतिशोध के शोले लपक रहे।
⚔️ वीर डाल हुंकार भर रही, उत्साह का चोला पहने,
दान, धरम और युद्ध-भूमि के, वीर सजाते इसके गहने।
😨 भयानक की छाया काली, भय का कम्पन लाती है,
खतरनाक जीवों को देख, अंतरात्मा थर्रा जाती है।
🤮 बीभत्स रूप है घृणित बड़ा, जुगुप्सा मन में भरता है,
मांस, रक्त और गंदगी देख, मुँह मोड़ने को जी करता है।
😲 अद्भुत शाखा अचरज भरी, विस्मय का दृश्य दिखाती है,
विचित्र अलौकिक बातें सुन, यह बुद्धि चकित रह जाती है।
🧘 शांत डाल है सबसे पावन, निर्वेद का पाठ पढ़ाती है,
मोह-माया का त्याग कराकर, प्रभु-चरणों में ले जाती है।
👶 वात्सल्य की कोमल गोदी में, वत्सलता का नेह पलता,
माता-पिता की ममता का झरना, इस डाली से सदा ढलता।
🙏 भक्ति रस का शिखर शीर्ष पर, देव-रति में लीन खड़ा,
ईश्वर के अनुराग में डूबा, सबसे पावन, सबसे बड़ा।
ऐसा है यह रस का वृक्ष, जो जन-मन को सरसाता है,
काव्य-प्रेमियों के अंतस को, भाव-अमृत दे जाता है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
15.10.2026

