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विक्रमशिला सेतु बंद छै — गंगा पार के पुकार छै-रोहित आनंद

एक अक्टूबर के भोर भेलै,

बदल गेलै संसार,

विक्रमशिला सेतु रुक गेलै,

थम गेलै आवागमन के धार।

तीन महीना मरम्मत खातिर,

बंद भेलै ई सेतु महान,

पूर्व बिहार के जोड़निहार,

बनलै आज चिंता के कारण।

गंगा के छाती पर ठाढ़ रहलै,

बरसों से ई सेतु,

भागलपुर सँ कोसी-सीमांचल,

जोड़लक लाखों के हेतु।

पूर्णिया, कटिहार, सहरसा,

मधेपुरा के राह,

एके पुल सँ जुड़ल रहलै,

कतेक घर-दुआर के चाह।

कतेक बेटा दिल्ली में छै,

कतेक सूरत में कमाय,

परब-पर्व में माई के आँगन,

सभके मन घर ले आय।

कोई कमाय गुजरात में,

कोई दिल्ली के बाजार,

छठ के घाट पर लौटे के,

सभके मन में प्यार।

दुर्गा पूजा के ढाक बजे,

मंदिर में सजतै द्वार,

माई के दर्शन खातिर उठतै,

मन में श्रद्धा अपार।

दिवाली के दीप जरतै,

आँगन होय उजियार,

दूर परदेस में बसल बेटा,

ताकतै अपन घर-दुआर।

फेर छठी मईया के पर्व छै,

लोक आस्था के मान,

घाट-घाट पर अरघ देबय,

ई बिहार के पहचान।

कोई हाथ में ठेकुआ नेने,

कोई नेने सूप-दउरा,

माई के घाट पहुँचय खातिर,

मन में बसलै आस अधूरा।

कहियो रेल सँ, कहियो बस सँ,

कहियो मोटर सँ आय,

गंगा पार के राह खुलतै,

तखन पर्व में रंग छाय।

मुदा आज सेतु बंद भेलै,

राह भेलै कठिन अपार,

कइसे पहुँचत परदेसिया बेटा,

अपन गाँव-घर-दुआर?

“गंगा पार करबय कइसे?”—

सभके मन में सवाल,

परब के दिन नजदीक आबै,

बढ़तै चिंता के जाल।

बुजुर्ग कहथिन—“बेटा आयतै”,

माई सजाबै थार,

बहिनी राखै बाट नयन में,

कब देखब अपन दुलार।

प्रशासन कहलक—नदी मार्गे,

वैकल्पिक राह बनतै,

जहाज-फेरी के माध्यम सँ,

गंगा पार कराबतै।

ग्यारह क्रूज चले के बात छै,

यात्री खातिर सेवा,

साइकिल-बाइक के व्यवस्था संग,

बढ़तै आवागमन के रेला।

मुदा गंगा के धार न बुझै,

कागज के कोनो बात,

जलस्तर बढ़ै, धारा तेज होय,

बदलै पल में घाट।

पहिल दिन के फेरी में देरी,

यात्री भेल परेशान,

व्यवस्था के जमीन पर मजबूत होय—

ई छै सबके अरमान।

नदी कोई सड़क नै छै गे,

नदी के अपन मिजाज,

हवा, धारा, जलस्तर बदलै,

बदलै यात्रा के राज।

नाव चले त सुरक्षा संग हो,

ई सबसे पहिल विचार,

जीवन सँ बढ़के किछु नै छै,

चाहे पर्व हो या व्यवहार।

लाइफ जैकेट रहय संग-संग,

प्रशिक्षित नाविक होय,

घाट पर रोशनी, पुलिस-सहायता,

हरदम तैनात होय।

महिला, बच्चा, बूढ़ा सबके,

सुविधा मिले अपार,

बीमार मरीज आ एम्बुलेंस खातिर,

सुरक्षित होय पार।

घाट-घाट पर सूचना रहय,

समय लिखल स्पष्ट,

कौन जहाज कतय सँ चलतै,

जानकारी होय दुरुस्त।

भीड़ बढ़तै पर्व के बेला,

तब बढ़तै सेवा के धार,

कतार बने, अनुशासन रहय,

सुरक्षित होय गंगापार।

पूर्णिया सँ जे आवै छै,

कटिहार सँ जे आय,

सहरसा-मधेपुरा के लोग,

भागलपुर में समाय।

नवगछिया के राह जुड़ल छै,

कोसी के संसार,

विक्रमशिला केवल पुल नै छै—

ई छै जीवन के आधार।

किसान के बाजार से जोड़ै,

व्यापारी के व्यापार,

छात्र के पढ़ाई से जोड़ै,

मरीज के अस्पताल-द्वार।

नौकरी खातिर रोज निकलै,

हजारों नर-नार,

सेतु बंद होय त असर पड़ै,

घर-परिवार पर अपार।

मरम्मत जरूरी छै भाई,

पुल मजबूत बनाय,

टूटल हिस्सा ठीक होय त,

भविष्य सुरक्षित होय।

आज जरा कठिनाई होय भले,

काल सुखद होय राह,

मजबूत पुल जब फेर खुलतै,

आसान होय सबके चाह।

मुदा मरम्मत संग-संग ई,

ध्यान रहय सरकार,

जनता के रोज के जीवन पर,

कम से कम पड़य भार।

परब के महीना बीच में छै,

भावना के सवाल,

घर लौटे वाला हर परदेसिया,

खोजै सुरक्षित हाल।

दिल्ली में जे मजदूरी करै,

सूरत में जे कमाय,

फोन पर माई के आवाज सुनै—

“बेटा, छठ में आय!”

ओही आवाज के भीतर छै,

गाँव-माटी के प्यार,

ओही खातिर सुरक्षित चाही,

गंगा पार के व्यवहार।

छठी मईया के अरघ खातिर,

दूर देश सँ लोग,

रेल-बस के लंबा सफर करै,

मन में श्रद्धा के योग।

कंधा पर दउरा, हाथ में सूप,

आँख में घर के नेह,

गंगा मैया के घाट पहुँचै,

ई सपना नै होय ढेह।

दीपावली के दीप जरै,

अन्हार भागै दूर,

दुर्गा पूजा में ढोल बजे,

मन होय प्रेम से भरपूर।

छठ के संझिया अरघ में,

सूरज देव के मान,

ई परब सभके जोड़ै छै,

ई छै अंग-भूमि के प्राण।

तें रास्ता जे कठिन भेलै,

मन नै होय उदास,

सुरक्षित व्यवस्था बनतै त,

आसान होय प्रवास।

जहाज बढ़े, घाट सुधरे,

समय पर चले सेवा,

गंगा पार के यात्रियों के,

मिलय भरोसा-भेवा।

नाविक के प्रशिक्षण होय,

सुरक्षा के पूरा ध्यान,

एसडीआरएफ के निगरानी,

घाट पर रहे जवान।

आपदा के हर परिस्थिति में,

तैयारी रहय तैयार,

तखन कहब—“गंगा पार के यात्रा,

सचमुच भेल सुरक्षित पार।”

अस्थायी ई बंदी छै,

स्थायी नै छै राह,

फेर खुलतै विक्रमशिला,

फेर आसान होय चाह।

स्टील के गर्डर, नयका स्लैब,

मजबूत होय आधार,

फेर दौड़तै गाड़ी-बस,

फेर गूँजतै सेतु-पार।

तखन शायद ई दिन सभ,

बनतै एक इतिहास,

कठिन समय में संग रहलै,

जनता के विश्वास।

गंगा के लहर कहतै—

“राह कभी रुकै नै छै,”

मेहनत आ व्यवस्था मिलके,

दूरी टिकै नै छै।

विक्रमशिला! तूँ खाली पुल नै,

तूँ अंग-भूमि के शान,

तूँ कोसी-सिमांचल के धागा,

तूँ लाखों के पहचान।

तूँ भागलपुर के हृदय जोड़ै,

तूँ नवगछिया के साँस,

तूँ पूर्णिया-कटिहार तक,

पहुंचाबै अपन विश्वास।

तूँ सहरसा के राह बनाबै,

मधेपुरा से नेह,

तूँ दिल्ली-सूरत में बसल बेटा,

लौटाबै माटी के देह।

आज तोंहर पहिया रुकलै,

गंगा पर उठलै धार,

मुदा जनता के आस नै रुकतै,

खुलतै फेर तोंहर द्वार।

दुर्गा मईया मंगल करथिन,

दीपावली दे उजियार,

छठी मईया कृपा करथिन,

सुरक्षित होय गंगापार।

माई के अँखिया बाट निहारै,

बाबू के मन अधीर,

परदेसिया जब घर पहुँचै,

हँस पड़ै परिवार गंभीर।

नाव चले सुरक्षित-सुरक्षित,

घाट रहे तैयार,

परब मनावै मिलके सब,

फेर हँसै अंग-अपार।

मरम्मत होय मजबूती संग,

सुरक्षित होय सेतु,

फेर हजारों सपना दौड़ै,

लेके अपन नया हेतु।

गंगा मैया साक्षी रहथिन,

माटी रहय गवाह—

विक्रमशिला फेर जुड़तै,

फेर खुलतै जीवन-राह।

सेतु बंद छै आज भले,

मन के सेतु न टूटै,

गाँव-परदेस के प्रेम के डोरी,

कबहूँ नै छूटै।

दुर्गा पूजा, दीपावली,

छठ के पावन धार—

सुरक्षित यात्रा, सहज व्यवस्था,

ई हो जनता के पुकार।

विक्रमशिला फेर खुलतै,

फेर जुड़तै संसार—

गंगा के लहर संग गूँजतै,

“जय अंग! जय बिहार!”

                     रोहित आनंद

बांका बिहार

डी. मेहरपुर

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