विश्वास और घाव – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
कमी किसी ने भी नहीं छोड़ी, हमें आजमाने में,
शेष कुछ न रहा इस मतलबी संसार में।
जो अपने थे, वही पीठ पीछे वार कर गए,
प्रसिद्ध थे जो कभी मेरा साहस बढ़ाने में।
कुछ परायों ने दी पीड़ा, जो हृदय को दुखा गए,
कुछ अपनों ने मुस्कुराकर गहरे घाव लगा गए।
हम तो बस सच्चाई के मार्ग पर चलते ही रहे,
पर वे अपनी ही सभा में हमें भुला गए।
अब तो अभ्यास सा हो गया है, हर घाव को छुपाने का,
संसार के सामने अकारण मुस्कुराने का।
आँसुओं को आँखों में ही रोक लेते हैं हम,
आवश्यकता नहीं बची अब कोई कथा सुनाने की।
क्योंकि विश्वास टूट गया है, हर संबंध को निभाने में,
थक चुके हैं हम इस झूठे संसार को मनाने में।
अब स्वयं से ही नाता है, स्वयं से ही प्रेम है,
क्या रखा है भला किसी और को अपना बनाने में।
जली है जो अंतरात्मा, उसकी भस्म ही अब संबल है,
इस निष्ठुर जग के कोलाहल में, मौन ही अब पावन है।
अपेक्षाओं की सूखी डाली पर, भ्रम के पत्ते टूट गिरे,
अंतर्मन के सूनेपन में, जागृत अब नया आत्मन है।
परवाह नहीं अब किसी की, न कोई अभिलाषा शेष रही,
छल की इस मरुभूमि में, तृष्णा की कोई बूंद नहीं।
अकेले चलना सीख लिया, एकांत ही अब आराधना है,
खुद को पाकर जाना हमने, अब कोई और विवशता नहीं।
घावों को हथियार बनाकर, अब नव-इतिहास रचाना है,
अंधियारे को चीर थपेड़े, उजियारा फैलाना है।
गिरी बर्फ तो क्या ही सोचना, पतझड़ का अंत निश्चित है,
अंतस की नव-ऊर्जा से अब, भोर नया लेकर आना है।
जो बीत गया सो बीत गया, अब बढ़ने की ही बारी है,
खुद की शक्ति पहचान ली जब, जग पर विजय हमारी है।
ठोकर ने चलना सिखलाया, मुड़ने का अब काम नहीं,
आत्मगौरव की मशाल ले, नव-जीवन की तैयारी है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

