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योग-रत्ना प्रिया

Ratna Priya

रत्ना प्रिया

सहज, सरल, स्वभाव मधुर, मुख पर हँसी का योग हो,
स्वस्थ तन हो, मन प्रसन्न, ऐसा अनुपम संयोग हो।

स्वस्थ जीवन का आधार, सशक्त तन-मन होता है,
हो शुद्ध भाव अंतस में तो, दिव्यता को बोता है,
हो रोग व पीड़ा शमन यह, रामबाण उपचार है,
यह पतञ्ञलि का अष्टांग योग, ऋषि का उपकार है,
सुव्यवस्थित जीवन में नहीं, कोई मनोरोग हो।
सहज, सरल, स्वभाव मधुर, मुख पर हँसी का योग हो।

अनुशासित होने पर ही, मनुज सफलता पाता है,
चित्त को वश में करने से, अनुशासन सध जाता है,
प्रकृति के संयम, नियम भी, अनुशासन में ढलते हैं,
समय-सीमा का पालन कर, एक चक्र में चलते हैं,
हो दृढ. मनोबल स्वयं का तब, सिद्ध सफल यह योग हो।
सहज, सरल, स्वभाव मधुर, मुख पर हँसी का योग हो।

प्रथम सुख, निरोगी काया, यह योग का उपहार है,
तन-मन-प्राण को ऊर्जित कर, देता नवल विचार है,
ब्रह्माण्ड के रहस्यों का, यह मस्तिष्क भंडार है,
जागृत कर दे सप्त चक्र को, योग मोक्ष का द्वार है,
देव दुर्लभ इस काया का, परमार्थ में उपयोग हो।
सहज, सरल, स्वभाव मधुर, मुख पर हँसी का योग हो।

रत्ना प्रिया
शिक्षिका (11 – 12 हिन्दी )
उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर
चंडी ,नालंदा

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