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धुंध और सूरज”धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

“धुंध और सूरज”
मन की थकी परछाईं है यह, केवल पल की तन्हाई।
यह कोई स्थाई हार नहीं, मत मानो तुम मन में भाई॥
जब जोश कहीं खो जाता है, विश्वास हमारा डिगता है।
तब थका हुआ यह मानव मन, खुद को हतोत्साहित करता है॥
लक्ष्य न जब स्पष्ट दिखाई दे, तब कदम भटकने लगते हैं।
उपहास उड़ाते लोग जब, तब सपने चुभने लगते हैं॥
जब बार-बार विफलता मिलती, डर मन पर हावी होता है।
झूठी तारीफों के बल पर, जब धीरज अपना खोता है॥
इक शंका भीतर सजती है, यह गूँज हृदय में जगती है।
“मुझसे न यह काम हो पायेगा”, ऊर्जा तन-मन की घटती है॥
कर्मों से पीछे हटने की, जब चाह हृदय में आती है।
निराश न हो ऐ राही तू, यह राह बदल भी जाती है॥
यह तो बस एक पड़ाव मात्र, किस्मत का झुकाव बदलेगा।
सच्ची हिम्मत के बल पर ही, यह भाग्य तुम्हारा चमकेगा॥
इस धुंध को अगर मिटाना है, तो खुद को आज जगाना होगा।
बाहर की झूठी बातों को, मन से दूर भगाना होगा॥
छोटे-छोटे से लक्ष्य बना, आगे ही कदम बढ़ाना है।
हर छोटी सी भी जीत का, उत्सव तुम्हें मनाना है॥
गिरना तो जग का नियम यहाँ, उठना पर तेरी मर्जी है।
हार मानकर बैठ जाना, कायर की दी यह अर्जी है॥
सकारात्मक सोच का थाम दामन, फिर से राह पर चलना है।
बनकर सूरज तमस चीरकर, तुझको फिर से निकलना है॥
मन के हारे हार यहाँ, और मन के जीते जीत सही।
तेरी हिम्मत ही लिखेगी, तेरी विजय की रीत नई॥
उठ खड़ा हो कमर कस ले अब, तू खुद में एक सवेरा है।
मिट जाएगी यह निराशा सब, जो आज गम का अंधेरा है॥
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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