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मूक वेदना और स्वर्ण मंडी-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
मौन खड़ी प्रकृति रोती है, अंबर से झरते आँसू,
पवित्र लगन की वेदी पर, क्यों बिखर रहे शीतल आँसू?
दो प्राणों के मिलन-क्षणों में, यह कैसी धुंध छाई है,
सपनों के सुकुमार उपवन में, लालच की मरु-बाई है।
डिग्रियों के स्वर्ण-पात्र में, बिकती मन की शुचिता आज,
मूक खड़ी संवेदनशीलता, देख रही यह निष्ठुर समाज।
हृदय-कमल का मोल लगाती, सांसारिक यह हाट यहाँ,
मवेशी सम मानव बिकता, खोई वह दिव्य विराट कहाँ?
झुक गया पिता का स्वाभिमान, संचित पूँजी के साथ यहाँ,
सर्वस्व लुटाकर भी याचक, खड़ा हुआ बेबस असहाय यहाँ।
छिपकर रोती है पितृ-आत्मा, कोनों में मुख को ढाँपे हुए,
बेटी का भाग्य संवारने को, हैं हाथ थके से काँपते हुए।
अट्टहास करता यह समाज, सभ्यता का मुखौटा पहने हुए,
चुपचाप निगलता संवेदना, सोने के भारी गहने हुए।
पूछता योग्यता रूप-रंग, पर भीतर लोभ का अंधकूप,
संस्कारों की बातें करते, ओढ़े ये दानव का घिनौना रूप।
मुरझा जाती सुकुमार कली, खिलने से पहले ही तरु पर,
जब लालच की बिजली गिरती, इस पावन दाम्पत्य-सदन पर।
नदियाँ जो बहती थीं अकलुष, अब मरुस्थल में खो जाती हैं,
सपनों की सूक्ष्मतम लहरियाँ, पाषाणी जग में सो जाती हैं।
कौतुक करती यह कनक-नगरी, मन के मर्म को क्या समझे,
जो मोल लगाती धड़कन का, वो इस विरह की तड़पन क्या समझे।
सतरंगी इच्छाएँ रोतीं, भौतिकता के कारागार में,
इंसानियत ही सिमट गई, इस निष्ठुर क्रय-विक्रय व्यापार में।
उठो ओ चेतना के नव-प्रभात! इस तमस-जाल को तोड़ चलो,
पैसों की मरुभूमि तजकर, सुरभित अंतस से नाता जोड़ चलो।
रिश्तों की पावन मर्यादा को, मत भौतिक परिधान दो,
बेटे-बेटियों के पावन घट को, मानवता का सम्मान दो।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला रानीगंज अररिया

