माँ के आँचल की छाँव है हिंदी,
माटी की सोंधी गंध है हिंदी।
पहली बोली, पहला सपना,
मन की पहली छंद है हिंदी।
गाँव की चौपालों में गूँजे,
खेतों की पगडंडी में बोले,
दादी की कहानी में,
बचपन बनकर मन में डोले।
यह तुलसी की भक्ति में बहती,
कबीर की निर्भीक पुकार है,
प्रेमचंद के पात्रों में बसती,
जनमन की सच्ची तस्वीर है।
यह श्रम की भाषा, प्रेम की भाषा,
आशा का विश्वास है हिंदी,
दूर खड़े दो मन को जोड़े,
ऐसा मधुर प्रकाश है हिंदी।
नहीं विरोध किसी भाषा का,
हर भाषा का मान रहे,
पर अपनी जड़ों से जुड़कर ही
अपना हिंदुस्तान रहे।
ज्ञान-विज्ञान के नव आकाश में
हिंदी भी परवाज़ करे,
नई सदी की नई चुनौतियों में
अपना सशक्त आगाज़ करे।
आओ, केवल एक दिवस नहीं,
हर दिन हिंदी का मान करें,
बोलें, लिखें, पढ़ें हिंदी में,
अपनी भाषा पर अभिमान करें।
मेरी कलम जब तक चलती है,
हिंदी का सम्मान लिखेगी,
मेरी हर धड़कन के भीतर
हिंदी हिंदुस्तान लिखेगी।
अर्जुन केशरी
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय मिर्धाचक आदिवासी टोला
कहलगांव, भागलपुर।

