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हे स्त्री आप साधारण नहीं हो

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॥ हे स्त्री! आप साधारण नहीं हो ॥
– गौरव कुमार तिवारी

हे स्त्री! आप साधारण नहीं हो,
माँ भवानी सी भुजाएँ तुम्हारी,
वात्सल्यता श्री राधा सी है।

तुम नवदीप सृजन हो भारत का,
नित नव प्रसून प्रतिपादित हैं तुमसे।

शैलपुत्री सी अटल, हिम-शिखर सी दृढ़ तुम,
प्रथम शक्ति, प्रथम प्रणाम, धरा की धृति हो तुम।
ब्रह्मचारिणी सी तपस्विनी, ज्ञान-तप में लीन,
त्याग, संयम, साधना की परम प्रतीक प्रवीण।।

चन्द्रघण्टा सी निनादिनी, धर्म का शंख बजाती,
अर्धचन्द्र ललाट पर, दुष्टों को भय दिखलाती।
कूष्माण्डा हो तुम ही, ब्रह्माण्ड की सृजनकार,
तुम्हारी मंद मुस्कान से ही, होता नव संसार।।

स्कन्दमाता सी ममतामयी, पुत्र-वत्सल, स्नेह-धार,
तुम ही जननी, तुम ही पालन, तुम ही क्षमा अपार।
कात्यायनी हो रण-चण्डी, असुर-विनाशिनी भवानी,
तुम्हारी भुजाओं में ही तो, शक्ति अष्ट-भुजाधारिणी।।

कालरात्रि बनकर तुम, तमस का नाश करती,
भयावह काल को भी तुम, चरणों में दास करती।
महागौरी सी शुभ्र-वर्णा, करुणा-धवल प्रकाश,
तुम्हारे श्वेत आँचल में, गंगा का पावन हास।।

सिद्धिदात्रि हो अंतिम, सिद्धि, बुद्धि की दात्री,
तुम पूर्णत्व हो सृष्टि का, हे नव-शक्ति विधात्री।

हे स्त्री! तुम ही आदि हो, तुम ही अनन्त हो,
तुमसे ही भारत का, प्रत्येक पंत हो।
तुम नवदीप सृजन हो, हे शक्ति-स्वरूपिणि,
नित नव प्रसून तुमसे, हे राष्ट्र-निर्माण-रूपिणि।।

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Gaurav Kumar tiwari

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