आदत का बंधन और संकल्प – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
आदत मनुज की है अनोखी, जाल ऐसा बुन रही,
इंसान की यह चेतना, बस बात इसकी सुन रही।
नुकसान इसका जानते, पर मन इसी में रमता है,
क्षण भर की राहत के लिए, यह सोच अपनी बेचता॥
स्वचालित विद्या होकर, चलता हमारा यह मनन,
सुख सुविधा के जाल में, खोया हुआ है यह जीवन।
बदलाव से डरता हृदय, पग आगे फिर बढ़ता नहीं,
कहता यही मन हारकर, यह ढीठ आदत छोड़ता नहीं॥
पर हठ अगर यह मोड़ लें, हम सत्य की ही राह पर,
निष्ठा और पुरुषार्थ का, संकल्प हो हर चाह पर।
तब यह पुरानी हठ हमारी, भाग्य को चमकाएगी,
जीवन-डगर के हर अँधेरे में, उजाला लाएगी॥
परतंत्र बनना है हमें, या आदतों का नाथ होना,
यह सोच ही तय करेगी, क्या अंत में है प्राप्त होना।
बदलो बुरी आदत सभी, अच्छी को अपनाते चलो,
इस हठ को पावन ध्येय का, आधार तुम बनाते चलो॥
दिन-रात के अभ्यास से, यह जाल गहरा हो गया,
चेतना की आँख पर, अज्ञान का पहरा हो गया।
पर एक छोटा सा कदम, हर रोज़ जो बढ़ता रहे,
विश्वास का दीपक हृदय में, रात-दिन जलता रहे॥
चंचल नदी सा यह सिमट, जब शांत मरुथल सा बने,
संयम हमारा ढाल बन, इस द्वंद्व में आगे तने।
हर एक पल सजगता, जब श्वास में घुल जाएगी,
यह सोई हुई किस्मत तभी, अँगड़ाई लेकर जागेगी॥
इतिहास गवाह है वही, जिसने स्वयं को जीत है,
आदत नहीं लाचारी अब, यह जीत का संगीत है।
उठो! सम्हालो डोर मन की, नव-सृजन की भोर हो,
तुम हो नियंता भाग्य के, जीवन न पतंग कमज़ोर हो॥
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

