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अदृश्य शत्रु – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

अदृश्य शत्रु – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

मूर्छित ब्रह्मांड पड़ा है देखो, जड़ता का साम्राज्य यहाँ है,
जिसने पाला इस दानव को, उसका जग में नाम कहाँ है?
यह वह महाकाल का फंदा, जो हर गति को रोक रहा है,
बढ़ते हुए कदम मानव के, पग-पग पर यह टोक रहा है।
द्वार बंद प्रगति के सारे, ताले जड़ दिए लोहे के,
सूरज की रश्मि बुझ जाती, बादल छाते हैं रोने के।
हर क्षेत्र यहाँ प्रतिबंधित है, थम जाती है समय की धारा,
आलस की इक मंद छुअन से, ढह जाता साम्राज्य हमारा।
यह कालकूट सा शत्रु भयंकर, जो सोए उसे डस लेता है,
चेतना, ओज और पौरुष को, पल भर में यह कस लेता है।
जो इससे संबंध निभाए, उसका तो सर्वनाश निश्चित है,
मिट जाता है उसका अस्तित्व, जो इस तमस से रंजित है।
उठो ओ राही! तोड़ो बंधन, इस शत्रु को संहार करो,
आलस की इस गहरी निद्रा पर, उद्यम का प्रहार करो।
खोल दो प्रगति के बंद कपाट, अंबर को झुकना ही होगा,
चल पड़े अगर तुम दृढ़ निश्चय से, तो वक्त को रुकना ही होगा।
यह वो अदृश्य सा बेड़ी है, जो महाबली को जकड़ रही,
बुद्धि की तीव्र धार को भी, यह पल में कुंठित कर रही।
बहती नदियाँ रुक जाती हैं, सागर का पानी सड़ता है,
जो आलस की गोदी में सोए, वह जीते जी ही मरता है।
यह सृजन की कोख को बांझ करे, विज्ञान के पंख कतर देता,
जो छू ले ऊंचे अंबर को, उसे धूल की गर्त में भर देता।
सामर्थ्य का सूरज ढल जाता, पौरुष का दीपक बुझ जाता,
इस दानव के अंधियारे में, कोई भी मार्ग न सूझ पाता।
इतिहास गवाह है जब-जब भी, कोई सिंहासन डोला है,
यह आलस ही था जिसने चुपके, विष का वो प्याला घोला है।
सब सुख का भक्षक है यह शत्रु, सब दुखों का यह दाता है,
जो इसे मित्र कह देता है, वह अपनी कब्र सजाता है।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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