अमृतमयी शरद पूर्णिमा – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
आया शरद पूर्णिमा का त्योहार,
प्रकृति कर रही अनुपम श्रृंगार।
नभ मंडल में बिखरा है उजाला,
अमृत रस बरसाने वाला।
सोलह कलाओं से सजे हैं चंदा,
दूर हुआ जग का दुख-मंदा।
निर्मल आकाश, धवल सी रात,
कहती है कोई अनकही बात।
अमृत की वर्षा होती है आज,
सजता है खीर का सुंदर साज़।
खुले आसमां तले इसे सजाते,
सुबह प्रसाद रूप सब पाते।
धन-धान्य की देवी लक्ष्मी आएं,
को-जाग्रति कह अलख जगाएं।
जो जाग रहा है भक्ति भाव में,
सुख-समृद्धि भर देतीं उसके संसार में।
काहा ने रचाया महारास महान,
गोपियों संग गाया प्रेम-गान।
वृंदावन की कुंज-गलियों में,
गूंज उठा संगीत फिजाओं में।
मौसम ने बदली है अपनी करवट,
शीतल पवन छुए मन का घट।
शरद ऋतु का हुआ शुभारंभ,
गुलाबी ठंड का हुआ आरंभ।
आध्यात्मिक चेतना जगाती है यह रात,
लाती है ईश्वर से मिलन की सौगात।
चंद्रमा की किरणों में बहती है शक्ति,
मन में जगाती प्रभु चरणों की भक्ति।
महालक्ष्मी का पावन जन्मोत्सव महान,
करता है जो पूजन, पाता वैभव-ज्ञान।
आत्मा का परमात्मा से होता है मिलन,
धन्य हुआ इस रात को पाकर मानव मन।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

