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अंधकार का शिल्पी – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

अंधकार का शिल्पी – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

जहाँ प्रकाश प्राण त्यागता है, वहाँ से हमारा युग आरम्भ होता है,
सत्य को जीवित समाधि दे, यहाँ भ्रम का व्यापार आरम्भ होता है।
हर श्वास एक षड्यंत्र है, हर शब्द एक समाधि है,
इस गुप्तचरी के खेल में, झूठ ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है।
मंच सजा है परछाइयों का, और हम वो व्यापारी हैं,
जो आँखों में धूल झोंककर, क्रय कर लेते पूरा दृश्य हैं।
बेचना पड़ता है वो प्रतिबिंब, जो कभी अस्तित्व में था ही नहीं,
यहाँ विश्वास दिलाना पड़ता है कि जो असत्य है, वही सत्य है।
पर मात्र छल के इस धुएँ से, कोई युद्ध जीता नहीं जाता,
जब तक बात मनवाने की कला, आत्मा में उतारी नहीं जाती।
वो कला—जो मौन से भी सामने वाले की सोच बदल दे,
जो शत्रु के दृढ़ संकल्पों को, जल की तरह पिघल दे।
वाणी में वो विष हो जो मधु सा मधुर लगे,
कि मृत्यु भी गले लगाए, तो वो जीवन का उपहार लगे।
जब झुक जाए संसार तुम्हारी वाणी के तेज के आगे,
तभी खुलते हैं सफलता के द्वार, इस गहरे अंधकार के पहरे के आगे।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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