अपना मंच, अपना सम्मान – शिवेन्द्र प्रकाश सुमन
दूजे मंच पर रचना छाए, चेहरे पर मुस्कान,
अपने मंच पर छपे वही, तो क्यों न हो अभिमान?
दूजे मंच की प्रशंसा पाकर, मन में फूल खिलते हैं,
अपने मंच की बारी आए, शब्द न जाने क्यों सिलते हैं।
कलम भी अपनी, भाव भी अपने, अपनी रचना खास,
अपने मंच पर भी दिखे, वही खुशी, वही उल्लास।
हर मंच का अपना गौरव, हर प्रयास का मान,
जहाँ मिले अभिव्यक्ति को अवसर, उसका भी सम्मान।
दूजे मंच पर गर्व जताएँ, अपने पर भी करें अभिमान,
अपनी रचना, अपना मंच—दोनों की बढ़ाएँ शान!
शिवेन्द्र प्रकाश सुमन
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