आज जाने की घड़ी पर,रो रहा है आसमां।
जो अभी परिवार ही हैं,कल रहेंगे पास ना।।
राम आए कृष्ण आए,छोड़कर सब चल दिए।
देश दुनिया नभ दुखी हैं,अश्रु ऑंखों में लिए।।
आज किंचित पल वही है,शुभ विदाई की घड़ी।
प्रेम की माला गुथी है,टूट जाए ना कड़ी।।
है हमें विश्वास हमसे,दूर तक जाऍं मगर।
दे हमें आशीष इतना,जिंदगी जाए सबर।।
आज पंडारक प्रखंडे,हो रहा जयकार है।
आपके कृत कर्म पावन,को नमन शतवार है।।
आपकी सेवा नहीं हम,भूल पाऍंगे कभी।
आपने जो स्नेह दी है,याद आऍंगे कभी।।
कह रहा”अनजान”अपना,आप अब निर्बंध हैं।
कल नया आगे खड़ा है,आ रहे शुभ गंध हैं।।
साॅंस अपनी हो गई है,अब लगी है चल रही।
ऑंसुओं में हर्ष भरकर,कामना अविरल रही।।
पाॅंव नव पगडंडियों की,कर रहा पहचान है।
मन विचारों से उलझता,हो रहा बलवान है।।
अब सुहाने दिन मिलेंगे,हम मगर सब दूर हैं।
सृष्टि कहती “मैं करूॅं क्या”,हम यहाॅं मजबूर हैं।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
मध्य विद्यालय दरवेभदौर

