भविष्य का भारत: संस्कारयुक्त राष्ट्रनिर्माण – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
केवल आधुनिकता की अंधी दौड़ में, शिक्षा अपनी दिशा खो रही है,
संस्कारों की भूमि पर आज, व्यभिचार और हिंसा की फसल बो रही है।
अपवित्र बुद्धि का यह कैसा अंधकार नई पीढ़ी को घेर रहा,
देख यह पतन देश का, हर संवेदनशील मन आज अश्रु बहा रहा।
भौतिक वस्तुओं और व्यवस्थाओं से तुम कभी इसे सुखी न कर पाओगे,
जब तक न बौद्धिक स्तर सुधारोगे, तब तक बस अशांति ही पाओगे।
लाख दे दो सुख-सुविधाएं, सोने के महलों में उन्हें सुला दो तुम,
पर हृदय अगर मलिन रहा, तो सुख की हर परिभाषा भुला दो तुम।
वैभव की चकाचौंध में कभी भी, आत्मा को शांति नहीं मिलती,
बिना वैचारिक शुद्धि के, जीवन की सुंदर कली नहीं खिलती।
जब तक कलुषता के साए इस पावन धरा पर मंडराएंगे,
तब तक हमारे देश के उज्ज्वल भविष्य के सपने टूट जाएंगे।
भारत की मिट्टी का मूल मंत्र, सदा से ही केवल धर्म रहा,
आध्यात्मिक चेतना ही यहाँ का, सबसे उत्तम कर्म रहा।
यही जो हमारी नई पीढ़ी है, जिसमें आज भटकाव सा दिखता है,
इन्हीं की शक्ति और सामर्थ्य से, कल का इतिहास यहाँ लिखता है।
इसी पीढ़ी की बाहों में छुपा, इस पावन राष्ट्र की रक्षा का भार है,
यही बनेंगे पुरोधा कल के, जिनसे चलना यह संसार है।
इन्हीं में से कोई बनेगा विधायक, कोई देश का प्रधान मंत्री कहलाएगा,
कोई राष्ट्रपति के गौरवमयी पद पर, अपना परचम लहराएगा।
कोई बनेगा मुख्यमंत्री, जो सुशासन की नई मिसाल देगा,
और कोई शिक्षक बन, ज्ञान का ऐसा अद्भुत प्रकाश फैला देगा।
शिक्षा में जब तक ज्ञान और संस्कारों का अनुपम मेल नहीं होगा,
तब तक इस महान राष्ट्र के नवनिर्माण का खेल नहीं होगा।
उठो और जगाओ इस पीढ़ी को, भौतिकता से ऊपर उठाना है,
हृदय को पावन कर इनका, भारत को फिर से विश्वगुरु बनाना है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

