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छंद-शास्त्र का सार:- धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर 

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

छंद-शास्त्र का सार:- धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर 

यहाँ मेरे द्वारा दी गई छंद शास्त्र की जानकारी को सरल, लयबद्ध और गेय काव्य (दोहे एवं कविता) रूप में प्रस्तुत किया गया है:

छंद-शास्त्र का सार

(लघु और गुरु)

काव्य जगत में छंद का, अनुपम है विज्ञान।

लघु और गुरु के नियम से, होता मात्रा ज्ञान॥

लघु का उच्चारण सुगम, मात्रा एक गिनाय।

खड़ी पाई (।) इसका चिह्न, ‘अ-इ-उ-ऋ’ में दिख जाय॥

गुरु का दूना समय है, ‘S’ चिह्न ठहराय।

मात्रा इसकी दो गिनो, दीर्घ स्वर यह कहलाय॥

यति, गति और तुक के नियम

पढ़ते सुंदर लय जगे, गति है उसका नाम।

जहाँ ठहरते मोड़ पर, यति पाती विश्राम॥

चरणांतों की साम्यता, तुक से सहज सुहाए।

तुकांत और अतुकांत से, कविता रूप सजाए॥

गण का अद्भुत सूत्र

तीन वर्ण के मेल से, गण का रूप अनूप।

“यमाताराजभानसलगं”, सूत्र परम सुख रूप॥

य-म-त-र-ज-भ-न-स कहें, आठों गण के नाम।

वर्णिक छंदों की यही, सिद्ध करे सब काम॥

मात्रा गणना के विशेष नियम

आधा अक्षर यदि जुड़े, पूर्व वर्ण गुरु होय।

‘अग्नि’ शब्द के ‘अ’ को, लघु न गिनेगा कोय॥

बिंदु (अनुस्वार) और विसर्ग भी, गुरु का रूप सँवारें।

चन्द्रबिन्दु को लघु रखें, छंद नियम अनुसारे॥

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

रानीगंज अररिया 

15.10.2026

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