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धरती का श्रृंगार – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

धरती का शृंगार निराला, हरी चुनरिया धानी है,

ये पेड़, ये पौधे, ये दूब-घास, कुदरत की अमिट कहानी है।

पूछता है मन कौतूहल से, ये कहाँ से जग में आए हैं?

किस आदि स्रोत से फूट पड़ी, जो धरा पे अंचल छाए हैं?

ब्रह्मांड के सूने आँगन में, जब जीवन का बीजारोपण हुआ,

सूरज की गर्मी, माटी की छुअन, सागर का जब आलिंगन हुआ।

तब शून्य से जीवन जाग उठा, कण-कण ने ली अंगड़ाई थी,

ईश्वर ने खुद अपने हाथों, यह हरी-भरी दुनिया सजाई थी।

कहाँ से आया यह घास-फूस, जो कदमों में बिछ जाता है?

ये तुच्छ नहीं, ये जीवन का सबसे पहला उजयारा है।

माटी को जकड़े रखने का, इसने ही बीड़ा उठाया है,

सूखे, उजाड़ इस आँचल पर, जीवन का महल बनाया है।

किस मकसद से हैं इस धरा पर? यह प्रश्न बड़ा ही पावन है,

इनके दम से ही बहती हवा, इनके दम से ही सावन है।

ये साँसें देते हैं हमको, खुद पी जाते हैं विष सारा,

इनकी सेवा, इनका अर्पण, इस जीवन का है मुख्य सहारा।

अब तक किस-किस ने जाना इसे? ऋषियों-मुनियों ने पहचाना,

विज्ञान ने इनके रहस्यों को, झुककर हर युग में माना।

आयुर्वेद के पन्नों ने, इनका ही तो गुणगान किया,

चराचर के हर एक ज्ञाता ने, इनको जीवन का प्राण कहा।

हर पेड़, हर पौधे का जग में, कोई न कोई मकसद है,

कोई फल से झोली भरता, कोई छाया देता बेहद है।

कोई नीम बन कड़वा होकर भी, रोगों को दूर भगाता है,

कोई तुलसी बन आँगन में, पावन शुचिता फैलाता है।

एक पत्ती भी बेकार नहीं, हर तिनके का अपना मान यहाँ,

यह सिर्फ नहीं है घास-फूस, छुपा इसमें भगवान यहाँ।

आओ इस शृंगार को पूजें, इसकी रक्षा का संकल्प करें,

ये पेड़-पौधे हैं तो हम हैं, इनके बिन हम सब नगण्य रहें।

                   धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

           प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

                   रानीगंज अररिया 

                                         

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