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दशहरे का दिव्य पंछी – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
कंठ नीला, रूप सुंदर, शिव का ही वो वास है,
दशहरे के पावन दिन पर, जिसका दर्शन खास है।
मंथन से जब विष निकला था, सृष्टि पर संकट भारी था,
पीकर हलाहल शिव कहलाए, नीलकंठ त्रिपुरारी था।
लंका पर जब चढ़ाई की, श्री राम ने तब यह पक्षी देखा,
बदली थी रावण की किस्मत, चमकी थी राघव की रेखा।
ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्ति, इस दर्शन ने दिलाई थी,
विजय पर्व की अमर कहानी, जन-जन ने हर्षाई थी।
प्राचीन काल में राजा जब भी, रणभूमि को जाते थे,
नीलकंठ की एक झलक से, जीत का संबल पाते थे।
खेतों में जब नई फसल की, बुआई का दिन आता था,
इस सुंदर पक्षी को पाकर, कृषक मन हर्षाता था।
नभ में उड़ता जो दिख जाए, भाग्य के द्वार खुल जाते हैं,
सफलता चूमेगी कदम, सारे संकट टल जाते हैं।
दाना चुगते दर्शन पा लो, तो धन-धान्य की बौछार हो,
मिटे दरिद्रता जीवन की, खुशियों का संसार हो।
शांत बैठकर जो सुख दे, वो मन को धीरज देता है,
क्लेश मिटाकर घर-आँगन में, सुख-शांति भर देता है।
आज ये पक्षी दुर्लभ है, इसे बचाना धर्म हमारा है,
तस्वीर देखकर शीश झुका लो, शिव का यही सहारा है।
हरी-भरी डालों पर इसकी, गूंजे मधुर तराना है,
प्रकृति के इस अनमोल रत्न को, अब हमको बचाना है।
पेड़ कट रहे, वन सिमट रहे, संकट में इसका रैन-बसेरा है,
जागो मानव अब तो जागो, होने को नया सवेरा है।
आओ मिलकर कसम ये खाएं, इस पंछी को संवारेंगे,
पर्यावरण की रक्षा करके, शिव की महिमा पुकारेंगे।
भावी पीढ़ी भी देख सके, नीलकंठ की सुंदर उड़ान,
तभी सफल होगी यह धरती, तभी बढ़ेगा भारत का मान।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

