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करो उद्धार प्रभु-कुमकुम कुमारी ‘काव्याकृति’

Kumkum

मुनि से शापित ये सुकोमल सी नारी,

हो गई उपेक्षित अहल्या बेचारी।

 महा तपस्विनी थी विदुषी जो नारी,

क्यों बन गई कड़ी सजा की अधिकारी।

देवराज इंद्र की छल की मैं मारी,

पड़ी हूँ राह में शिला बन मैं नारी।

 अग्नि सी शुद्ध थी पतिव्रता वो नारी,

हो गई क्यों शंकित क्या थी नाचारी।

 आओगे राघव कब कुटिया हमारी,

पूछती है तुमसे शापित ये नारी।1

पितामह की थी मानस पुत्री प्यारी,

पाथर बन पड़ी है बेबस बेचारी।

आ जाओ राघव सुन विनती हमारी,

पड़ेगी कब दृष्टि रघुनंदन तुम्हारी।

होगी कब शाप से रिहाई हमारी,

पूछती है पथराई अक्षि हमारी।

प्रातः स्मरणीय अति पावन ये नारी,

बन गई है सिल है कैसी लाचारी।

जगत की थी सबसे सुंदर जो नारी,

मनीषी गौतम की थी भार्या प्यारी।

बन गई है प्रस्तर थी जो सुकुमारी,

आ जाओ हे राम आस है तुम्हारी।

हर लो हे नाथ अब विपदा ये सारी,

अपने पग रज से करो मुक्ति हमारी।

हे रघुकुलभूषण विष्णु के अवतारी,

सुन लो हे भगवन अब विनती हमारी।

कुमकुम कुमारी ‘काव्याकृति

मध्य विद्यालय बाँक, जमालपुर

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