काव्य का आभूषण: अलंकार – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
शब्दों का जब चमत्कार हो, कविता की बढ़ती शान।
भाषा सुंदर रूप धरे, शब्दालंकार पहचान॥
इसके प्रमुख भेद (काव्य रूप में):
अनुप्रास: एक ही वर्ण जो बार-बार आए, “तरनि तनूजा” याद दिलाए। (अनुप्रास)
यमक: शब्द एक, पर अर्थ अनेक बार बदले, “कनक-कनक” से जग बौराए। (यमक)
श्लेष: शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो, अर्थ छुपे हों उसमें तीन, “पानी” जैसे मोती, मानुष, चून रंगीन। (श्लेष)
अर्थालंकार की परिभाषा:
जहाँ अर्थ से सजे कविता, भावों में रस घोल।
अर्थालंकार उसे कहते हैं, समझो इसका मोल॥
इसके प्रमुख भेद (काव्य रूप में):
उपमा: ‘सा, सी, से, सरिस’ जहाँ आए, “पीपर पात” सा तुलना कराए। (उपमा)
रूपक: उपमेय-उपमान का भेद मिटाए, सीधे “चन्द्र-खिलौना” बन जाए। (रूपक)
उत्प्रेक्षा: ‘मानो, जानो, मनहुँ’ जब आए, नीलमणि पर्वत पर धूप दिखाए। (उत्प्रेक्षा)
अतिशयोक्ति: बात को इतना बढ़ा-चढ़ा दे, बिना सोचे ही नदिया पार करा दे। (अतिशयोक्ति)
मानवीकरण: पेड़, पौधे जब इंसानों से मुस्काए, “मेघ आए बड़े बन-ठन के” गाए। (मानवीकरण)
उभयालंकार की परिभाषा:
शब्द और अर्थ दोनों मिलकर, जहाँ बढ़ावे मान।
दोनों का सुंदर संगम ही, उभयालंकार की शान॥
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

