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शब्दों की महफ़िल: छंदों के संग – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
शब्द-विचार: काव्य रूप में
1. सार्थक और निरर्थक शब्द
वर्ण मिले तो शब्द बने, जिनका सुंदर मेल।
अर्थ बताए जो सही, सार्थक उसका खेल॥
जैसे— पानी, चाय हैं, जिनका अर्थ महान।
वाणी, वाय निरर्थक हैं, जिनका कोई न मान॥
2. उत्पत्ति के आधार पर (तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी)
संस्कृत से जो आ गए, बिना रूप बदले मीत।
तत्सम उनको जानिए, जैसे अग्नि और गीत॥
रूप बदलकर जो बने, हिंदी की पहचान।
तद्भव कहलाते वही, जैसे आग सुजान॥
अपने ही देश में जन्मे, बोली से जो आए।
देशज शब्द कहाते वे, लोटा, खिड़की भाई॥
बाहर के देशों से आए, उर्दू, इंग्लिश बोल।
विदेशी कहलाते वही, डॉक्टर, चाकू अनमोल॥
3. बनावट के आधार पर (रूढ़, यौगिक, योगरूढ़)
टुकड़े करने पर मिले, कोई अर्थ न भाई।
रूढ़ शब्द वे कहलाते, जैसे घर और गाई॥
दो शब्दों के मेल से, बनते सुंदर रूप।
यौगिक वे कहलाते हैं, विद्यालय अनूप॥
मेल से बने पर छोड़ दें, अपना सीधा अर्थ।
योगरूढ़ वे होते हैं, देते विशेष अर्थ॥
जैसे जलज कमल को कहते, दशानन रावण मान।
अर्थ विशेष बताते जो, रखें अलग पहचान॥
4. प्रयोग के आधार पर (विकारी और अविकारी)
लिंग, वचन और काल से, जो बदलें हर बार।
विकारी शब्द कहाते वे, जैसे लड़का, कार॥
संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण इसके भेद।
रूप बदलते पल-पल में, करते नहीं निषेध॥
कभी न बदलें जो शब्द, चाहें बदले काल।
अविकारी या अव्यय कहें, चाल रहे एक ढाल॥
जैसे— धीरे, और, तथा, अहा का ठाट।
व्याकरण के नियमों का, यही है सुंदर पाठ॥
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

