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काव्य का स्वरूप और भेद – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
काव्य एक सुंदर विधा है, जो मन में रस घोले,
शब्द और अर्थ के मेल से, अंतर्मन में बोले।
आचार्य विश्वनाथ ने भी, यही बात समझाई,
“रसात्मकं वाक्यं काव्यम्”—रस ही इसकी परछाई।
मुख्य रूप से रूप के आधार पर, इसके भेद हैं दो,
श्रव्य और दृश्य रूप में, मन को भाते जो।
पहला भेद है श्रव्य काव्य, जो सुना-पढ़ा जाता है,
इसके भीतर भी भेदों का, सुंदर रूप समाता है:
• प्रबंध काव्य: यह लंबी, क्रमबद्ध कथा बतलाए।
• महाकाव्य: जो रामचरितमानस सा, पूरा जीवन दिखलाए।
• खंडकाव्य: जो पंचवटी सा, जीवन का एक अंश सुनाए।
• मुक्तक काव्य: कबीर के दोहों सा, जो स्वतंत्र और छोटा,
हर एक पद में पूर्ण अर्थ है, भाव नहीं है खोटा।
दूसरा भेद है दृश्य काव्य, जो मंचन कर दिखलाता,
नाटक, एकांकी और फिल्म बन, आँखों को यह भाता।
शैली के भी आधार पर, इसके रूप अनोखे तीन,
साहित्य जगत की बगिया को, करते हैं जो हसीन।
• गद्य काव्य: जो कहानी जैसा हो, पर काव्य सा आनंद दे।
• पद्य काव्य: जो लय और छंदों से, मन को पूरी तरह बांध दे।
• चंपू काव्य: जिसमें गद्य और पद्य दोनों, मिलकर रंग जमाते हैं,
मिले-जुले इस सुंदर रूप से, सबके मन को हर्षाते हैं।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

