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कृष्ण – रत्ना प्रिया

Ratna Priya

रत्ना प्रिया

कृष्ण – रत्ना प्रिया

द्वापर युग में आए थे तुम, कलियुग में भी आना कृष्ण,
दुष्टजनों के पाप नाशकर, धर्म का भाव जगाना कृष्ण।

नंद-यशोदा के आँगन में, वृंदावन की गलियों में,
यमुना की लहरों में तुम थे, मधुवन की हर कलियों में,
गोपियों की निश्चल भक्ति में, कदम की ऊंची डालों में,
बाल-सखा के रूप तुम्हीं थे, तेरी छवि थी ग्वालों में,
माखन-मिश्री, दूध-मलाई, फिर से खाने आना कृष्ण।
द्वापर युग में आए थे तुम, कलियुग में भी आना कृष्ण।

चंद्रमा की सोलह कलाए, तेरा परिचय देती है,
शरद् की पूनम चाँदनी में, अमृत सरस भर देती है,
परमात्मा के पूर्ण रूप को पति रूप में पाऊँगी,
गोपियाँ हैं प्रेममग्न माधव संग रास रचाऊँगी।
दिव्य नृत्य व प्रेमभाव से तृप्त हमें कर जाना कृष्ण।
द्वापर युग में आए थे तुम, कलियुग में भी आना कृष्ण।

श्री राधा समस्त गुणों में परमब्रहम की शक्ति हैं,
परमात्मा की अभिव्यक्ति में अटूट प्रेम व भक्ति हैं,
राधा का है रूप कृष्ण में, कृष्ण चिन्मयी राधा हैं,
नर-नारी के भाव मिले तो, नारायण को साधा है,
प्रेम के बंधन से जुड़ जाऊँ स्नेह-भाव जगाना कृष्ण।
द्वापर युग में आए थे तुम, कलियुग में भी आना कृष्ण।

श्रीमुख से निकली है गीता, जीवन- सार संगीत है,
कर्तव्यपूर्ण है जीवन-दर्शन, ईश्वर का उद्गीथ है,
क्या खोया व पाया जग में खाली हाथ ही आए थे,
पूर्वकर्म संग में लाए थे, संचित फल ही पाए थे,
गीता के मधुर मंत्रों को पुनः धरा पर गाना कृष्ण।
द्वापर युग में आए थे तुम, कलियुग में भी आना कृष्ण।

रत्ना प्रिया
शिक्षिका (11 – 12 हिन्दी )
उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर
चंडी, नालंदा

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