अपने आँचल में अथाह सागर समेटे,
माथे पर शीतल चाँद सजाए।
अपनी गोद में समस्त सृष्टि को बसाए,
ओ! कोई नहीं—मेरी माँ वसुंधरा, मेरी माँ धरा॥
तेरी गोद में ऋषि, मुनि, संत, महात्मा पले,
तेरी गोद में ही वीरों ने इतिहास रचे।
हाँ, कभी-कभी दानव भी जन्म लेते हैं,
किन्तु तेरी ममता के द्वार
कभी किसी के लिए बंद नहीं होते।
कोई तेरी मिट्टी में
पुण्य के पुष्प खिलाता है,
तो कोई अहंकार, अन्याय और अधर्म के
काँटों का जंगल उगाता है।
फिर भी तू क्रोधित नहीं होती,
सबको समान स्नेह से अपनाती है।
इतना विशाल हृदय—
इतनी असीम करुणा—
तेरे अतिरिक्त किसमें समाती है?
ओ! कोई नहीं—मेरी माँ वसुंधरा, मेरी माँ धरा॥
अपना सीना चीरकर
अन्न के स्वर्णिम खेत उगाती है।
निर्मल जल की धार बहाती है।
औषधियाँ, वन, उपवन, फल और फूलों से
धरती का आँचल महकाती है।
तेरी हरियाली से जीवन मुस्काता है,
तेरे आँचल से संसार खिलखिलाता है।
ओ! कोई नहीं—मेरी माँ वसुंधरा, मेरी माँ धरा॥
तू धूप भी सहती है,
तू वर्षा भी सहती है।
तू मानव के पाप भी सहती है,
फिर भी प्रेम का अमृत ही बहाती है।
अच्छे-बुरे सब बच्चों को
एक समान दुलार देती है।
किसी प्राणी का अहित नहीं करती,
सबका मंगल ही करती है।
ओ! कोई नहीं—मेरी माँ वसुंधरा, मेरी माँ धरा॥
हे माँ!
तेरी इस पावन मिट्टी को
मैं सहस्र बार प्रणाम करता हूँ।
जब-जब भारत की सेवा का संकल्प लेता हूँ,
सबसे पहले तेरी पवित्र मिट्टी का
अपने ललाट पर तिलक करता हूँ।
मेरी साँस-साँस तेरा ऋण चुकाने में बीते,
मेरा जीवन मातृभूमि के काम आए।
जब तक इस तन में प्राण रहेंगे,
तेरा यश ही मेरा गान रहेगा।
वंदे मातरम्!
जय वसुंधरा!
जय मातृभूमि!
जय हिंद!
रचनाकार:-
उमेश कुमार सिन्हा
डिसेंट एकेडमी बाया स्कूल
तुलसी पथ लालपुल रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वरनाथ)धाम
जिला – बक्सर

