नवरात्रि – अर्चना कुमारी
नवरात्रि का आया पावन त्योहार
देखो सज गया माँ का तोरण द्वार
दसों दिशाएँ हुईं हर्षित, सुरभित
अब दूर करो माँ हर कष्ट विकार
अंतस की देवी का करें आह्वान
क्यों बनी हैं नारी निरीह, निष्प्राण
काम, क्रोध हर लोभ, मोह का
अपने आत्मबल से करो निदान
कलुषित है मन, पाप अति भारी
है भँवरजाल में फँसी क्यों नारी
तिरोहित कर हर तमस तोम को
अंतस भर दो अब शक्ति हमारी
वक़्त रहते कर असुर संहार
जो अस्मत को करे तार-तार
दिखा अब रौद्र रूप कुछ ऐसा
कर दे भस्म बन कर अंगार
हो गर नारी का शीलहरण
चाहे हो उनका कहीं शोषण
हे द्रौपदी फिर चुप ना रहना
कर लेना निज शक्ति परीक्षण
अपनी शक्ति आप ही जानो
हर उलझन को खुद पहचानो
करके रौशन राहों को अपनी
जीवन की हर गति को जानो
कमजोर नहीं तू है शक्तिशाली
तू आदिशक्ति दुर्गा पराक्रमवाली
सहनशीलता की सीमा जब टूटे
आन पर आए तो बने तू काली
नवल चेतना संग करें नव-जागरण
नव स्फूर्ति से गूँजे ये धरा – गगन
नव रूपों की हम करें आराधना
हो ज्योतिर्मय हर घर औ’ आँगन
अर्चना कुमारी

