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नौ दिनों तक माँ के जयकारे – रिंजु सिंह
मंदिर में सजते फूलों के गलियारे।
माँ दुर्गा के चरणों में शीश झुकाएँ,
दीप जलाकर अपनी श्रद्धा दिखाएँ।
पर एक सवाल मन में उठता है,
दिल हर बार यही पूछता है—
जिस नारी में माँ का रूप नज़र आता है,
फिर उसी नारी पर संकट क्यों छा जाता है?
नवरात्रि में कन्याओं के पाँव पखारते हैं,
उन्हें देवी मानकर भोजन कराते हैं।
फिर नौ दिन बीतते ही क्यों भूल जाते हैं,
उनके सम्मान और सुरक्षा की बात क्यों भुलाते हैं?
किसी गली में कोई बेटी बेबस हो,
किसी की चीख में दर्द का एहसास हो,
तो क्या हमारा धर्म बस पूजा तक है?
क्या हमारी इंसानियत केवल दिखावा तक है?
जब किसी बेटी पर अत्याचार हो रहा हो,
जब उसकी दुनिया में अँधियारा हो रहा हो,
तब केवल तमाशबीन बनकर मत रहना,
उसकी आवाज़ बनना, उसे अकेला मत करना।
माँ दुर्गा की आरती उतारने वालों,
अपने भीतर के साहस को भी जगाने वालों।
अन्याय के आगे जब तुम खड़े हो जाओगे,
तभी सच्चे अर्थों में माँ के भक्त कहलाओगे।
नवरात्रि के बाद भी यह संकल्प निभाना,
हर बेटी को अपनी बेटी-सा मानना।
पूजा के दीप केवल मंदिर में नहीं,
इंसानियत के दीप जलें हर दिल में कहीं।
माँ दुर्गा केवल प्रतिमा में नहीं, हर नारी के सम्मान में हैं,
उनकी सच्ची आराधना हर बेटी की सुरक्षा और स्वाभिमान में है।
जय माता दी!
रिंजु सिंह

