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परंपरा और प्रगति का संगम – उमेश कुमार सिन्हा 

Umesh kumar sinha

बालिका दिवस — परंपरा और प्रगति का संगम उमेश कुमार सिन्हा 

क्यों ? मनाते हैं दिवस आज, यह बात समझना होगा,
बेटी के सपनों को भी, आकाश समझना होगा।
नारी का सम्मान हमारा, सदियों से संस्कार रहा,
बेटी, बहन और माँ के रूप में, उसका ऊँचा स्थान रहा।

समय बदला, सोच भी बदले, बदले जग के काम,
नई दिशा में बढ़ते जाएँ, लेकर पुरखों का नाम।
जो परंपरा प्रेम सिखाए, उसका करें सम्मान,
जो अधिकारों में बाधा डाले, उसका हो निदान।

हर पुरानी रीति बुरी नहीं, हर नई सोच महान नहीं,
बिना विचारे दोष लगाना, बुद्धिमानी की पहचान नहीं।
दोष किसी का जन्म नहीं है, दोष गलत व्यवहार,
मिल-जुलकर ही दूर करेंगे, भेदभाव की दीवार।

बेटी पढ़े, आगे बढ़े, छुए सफलता का आकाश,
बेटे-बेटी दोनों को हो, अवसर और विश्वास।
नारी-नर के मेल से ही, जीवन का विस्तार,
एक-दूसरे के मान से ही, सजे धरा-संसार।

आओ मिलकर शपथ ये लें, इतना रखें विचार,
बेटी का सम्मान बढ़े, बेटों से भी रहे सद्भाव।
संस्कारों की जड़ मजबूत हो, प्रगति के खिलें गुलाब,
परंपरा और परिवर्तन से, बने सुनहरा ख्वाब।

दिवस मनाने का अर्थ यही, जागे सबमें ज्ञान,
बेटी को अधिकार मिले और संस्कृति का रहे मान।

स्वरचित, रचनाकार:
उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक’
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
तुलसी पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर
जिला – बक्सर

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