प्रथम शैल पुत्री – अरविंद मिश्र “नीरज”
प्रथम शैल पुत्री हे देवी, पर्वतराज दुलारी हे।
सुंदर सुभग मनोहर माता ,बसहाबरद सवारी हे।।
दहिन हाथमे त्रिशूल सुशोभित ,
बामा करमे पुष्प कमल।
स्वर्ण मुकुट अति सुन्दर चमकै,
अर्ध चन्द्रमा भाल विमल ।
दक्षसुता शती अहि छी माता बृषभभानु दुलारी हे।।
सुंदर सुभग मनोहर माता,बसहाबरद सवारी हे। ।
पिता यज्ञमे अहाँ हे माता,
पति अपमान नै सहि सकलौ।
निजकेँ दै आहुति हे माता,
यज्ञ अग्निमे जा जड़लौ।
पुनः प्राप्त कय देह अहाँ, हिमवान गेह अवतारी हे।
सुंदर सुभग मनोहर अहाँकेर बसहाबरद सवारी हे।।
कठिन तपस्या सँ हे माता,
प्राप्त केलौ पुनि शंकरकेँ।
कामअरी केँ वरण केलौ माँ,
जगत विदित अभयंकर केँ।
मन वांच्छित सिद्धि वर दायिनि, अर्धांगिनि त्रिपुरारी हे।
सुंदर सुभग मनोहर छी माँ,बसहाबरद सवारी हे।।
रचना
अरविंद मिश्र “नीरज ” (कवि जी), सहरसा

