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“सप्तमं कालरात्रीति” – अरविंद मिश्र “नीरज”
गुज गुज अन्हार सन रूप विकराल केने,
मृत्युकेँ परास्त केने काल बेतहास केने।
गर्धव केर ऊपर सवार,
पुजव माँ कालरात्रि संकट सँ करती उद्धार
केश जटाजूट भेल विखरल उत्ताण्ड सन,
रक्त नयन तीन जेना गोल ब्रह्मांड सन।
चमकै विजुरिया के तार।
पुजव माँ कालरात्रि विपति सँ होयब हम पार।।
काँट भरल लोह दण्ड खर्ग वाम हाथ मे,
रौद्ररूप रक्तवसन मैया के गात मे।
आर्त केर सुनियौ पुकार,
पुजव माँ कालरात्रि पार करब संकट के धार।।
ऊर्ध्व दहिन हाथ वरमुद्रा मे माता,
नमित हाथ अभय निज भक्त केर दाता।
माँ हे हमरोलय बनियौ उदार,
पुजव माँ कालरात्रि संकटसँ होयत उद्धार।।
रचना
अरविंद मिश्र “नीरज” (कवि जी), सेवानिवृत्त प्राध्यापक, सहरसा

