Site icon पद्यपंकज

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

लौ देखी ऐसी शिक्षा की,फूट रही फुलझड़ियाॅं।

उजले कागज कार हो रहे,जुड़ी हुई हैं कड़ियाॅं। 

फूट रही फुलझड़ियाॅं……

पढ़ता बालक लग्न मगन है,भाग रही हैं घड़ियाॅं।

दीप ज्वलित भरपूर लौ में,टूटे कभी न लड़ियाॅं।

फूट रही फुलझड़ियाॅं……

आसपास एकांत तपस्वी,गहराई में जड़ियाॅं।

पेपर पर है सुभग सुलेखन,जैसी सुंदर चिड़ियाॅं।

फूट रही फुलझड़ियाॅं……

शब्दकोश संवाहित करती,चंचल चित्त खुपड़ियाॅं।

स्वप्न लोक में जब तुम जाते,स्वागत करती परियाॅं।

फूट रही फुलझड़ियाॅं……

थके हुए जब होते तुम हो,करती भोग ॲंतड़ियाॅं।

कहे कवि”अनजान” रे भाई,बुला रही तस्तरियाॅं।

फूट रही फुलझड़ियाॅं…..

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

मध्य विद्यालय दर्वे भदौर

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version