Site icon पद्यपंकज

नए वर्ष की नयी उम्मीदें -रुचिका

नए वर्ष की नयी उम्मीदें

देखो,
फिर ठिठुरते,कंपकंपाते
दिसंबर की सर्द रातों संग
ये वर्ष अपनी अंतिम साँसें ले रहा है
और
फिर हमारे सोचों का सिलसिला
जनवरी से लेकर
दिसंबर तक की गणित में उलझा
यह हिसाब लगा रहा है।
क्या था जो अधूरा रह गया
क्या था जो पूरा होकर
यादों में बस गया
और क्या है
जिसकी ख्वाहिशें बस अभी
जेहन में ही रह गयी है।
सुनो,
दिसंबर की सर्द रातों में
कुछ अनकहे दर्द
से ये गुजारिश चल रही है
नही आना फिर जनवरी में।
लौट जाना दिसंबर संग।
ताकि जनवरी के नए वर्ष होने का
भरम बना रहे।
और स्वागत करें
नए वर्ष का
खुले दिल से
बाँहें फैलाये।

रूचिका
प्रधान शिक्षिका
प्राथमिक विद्यालय कुरमौली,
गुठनी सिवान बिहार

1 Likes
Spread the love
Exit mobile version