नहीं चाहूँ स्वर्णिम वैभव का मुझ पर राजतिलक हो,
नहीं चाहूँ यश का सूरज मेरे ही आँगन उदित हो।
नहीं चाहूँ ऊँचे पद का क्षणभंगुर अभिमान मिले,
दीन-हृदय की करुण पुकार से मेरा मन अनजान मिले।
नहीं चाहूँ भीड़ पुकारे—”यही महान, यही श्रीमान!”,
यदि पीड़ित की आँखों में फिर जीवित न हो विश्वास-प्राण।
बस इतनी अभिलाषा, प्रभु! जीवन मुझको ऐसा देना,
दुख की धूप में झुलसे जन को सेवा का बादल देना।
जहाँ प्रलय की प्रचंड धार घर-आँगन सब बहा गई हो,
जहाँ भूख किसी शिशु के अधरों की हँसी चुरा गई हो।
जहाँ वृद्ध प्रतीक्षा करता हो अपने ही अपनों की,
जहाँ रोगी की रात कटे केवल मौन सिसकियों की।
जहाँ न तन पर वस्त्र शेष हों, न सिर पर अपना छाजन हो,
जहाँ मनुष्य मनुष्य होकर भी सबसे अधिक विवश जन हो।
मुझको वहीं पुकार लेना, मेरा हर श्वास समर्पित हो,
हर श्रमकण मानव के दुख-हरण का पावन यज्ञ-समिधित हो।
मेरे हाथ किसी भूखे की पहली गरम रोटी बनें,
मेरे पाँव भटके जन-मन की साहस-भरी पगडंडी बनें।
मेरी वाणी टूटे मन में नव-आशा का दीप जलाए,
मेरा जीवन सूखे वन में सावन बनकर हरियाए।
न धन माँगूँ, न यश माँगूँ, न जग का अभिनंदन चाहूँ,
हर आँसू की अंतिम बूँद पोंछ सकूँ—बस इतना चाहूँ।
जब जीवन का दीप बुझे और अंतिम क्षण मेरे आएँ,
इतना ही इतिहास लिखे यह भारतवर्ष की पावन धरा—
“स्वयं अल्प सुख लेकर जिसने, सबके दुःख का भार लिया;
मानव बनकर जन्म लिया और मानवता को सार दिया।”
भावार्थ
इस कविता में कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उसे धन, पद, यश और वैभव की इच्छा नहीं है। वह चाहता है कि उसका जीवन पीड़ित, निर्धन, भूखे, रोगी, अकेले और आपदा-ग्रस्त लोगों की सेवा में समर्पित हो। कवि के लिए सबसे बड़ा सम्मान प्रसिद्धि नहीं, बल्कि किसी दुखी व्यक्ति के जीवन में आशा जगाना है। वह चाहता है कि उसके हाथ भूखों की रोटी बनें, उसके कदम भटके हुए लोगों का सहारा बनें और उसके शब्द निराश मन में नया विश्वास जगाएँ। अंत में कवि की अभिलाषा है कि उसकी पहचान उसके धन या पद से नहीं, बल्कि मानवता के लिए किए गए निःस्वार्थ सेवा-कार्य से हो।
उमेश कुमार सिन्हा, निर्देशक
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल
तुलसी पथ लाला पुल, रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर (श्री ब्रह्मेश्वरनाथ धाम)
जिला – बक्सर

