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सुहाग का पर्व: करवा चौथ_धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

सुहाग का पर्व: करवा चौथ

व्रत करवा चौथ का पावन, प्रेम का यह पर्व महान,
रखती हैं सुहागिनें देखो, पति की लंबी उम्र की तान।
कार्तिक मास कृष्ण की सुंदर, आती जब यह पावन रात,
भूखी-प्यासी रह कर नारी, रचती एक अनूठी बात।
सतयुग से है प्रथा पुरानी, जब असुरों से युद्ध मचा,
ब्रह्मा जी की बात मान तब, देवियों ने था व्रत रचा।
महाभारत में कृष्ण के कहने पर, द्रौपदी ने भी था ठाना,
अर्जुन की रक्षा की खातिर, इस पावन व्रत को था माना।
नाम पड़ा ‘करवा’ माता पर, जिसने यम से युद्ध किया,
सूत के कच्चे धागे से भी, पति का पावन प्राण लिया।
मिट्टी का वह सुंदर करवा, गणपति का ही रूप कहाए,
चंद्र देव को अर्घ्य देकर, हर नारी जीवन महकाए।
यह केवल उपवास नहीं है, प्रेम-समर्पण की गाथा,
जिसके आगे श्रद्धा से है, झुक जाता जग का माथा।
सजकर बैठीं सब सुहागिनें, चाँद का रहता इंतज़ार,
अमर रहे यह अटूट बंधन, बढ़ता रहे सदा ही प्यार।
हाथों में रची पिया की महकती, लाल-गुलाबी सुंदर महँदी,
माथे पर बिंदिया चमके ऐसे, जैसे किरणों की हो अनबंदी।
लाल चुनरिया ओढ़ पिया की, रूप सलोना निखर आता,
सोलह श्रृंगार से आज हर आँगन, खुशियों के गीत गाता।
छलनी की ओट से जब वो देखें, अपने चाँद सा प्यारा मुखड़ा,
मिट जाता है पल भर में फिर, विरह का सारा दुखड़ा।
चरण छुए जब अपने पिया के, आशीष मिला पावन अनमोल,
युगों-युगों तक बना रहे यह, जीवन का सबसे सुंदर झोल।

                                       धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 
                                      प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 
                                        रानीगंज अररिया
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