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स्वयं की खोज – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

स्वयं की खोज – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

जो मैं कभी था ही नहीं…
कभी क्षमा नहीं करूँगा मैं उन चेहरों को,
जिन्होंने हर पग पर मेरे धैर्य को परखा है।
मेरे हँसते हुए निष्पाप हृदय के कोने में,
जिन्होंने घोर घुटन का एक सागर भरा है।
दिए ऐसे आघात कि प्रसन्नता से भय होने लगा,
हर मुस्कान के पीछे कोई षड्यंत्र दिखाई देता है।
विवश किया इस भाँति कि वाणी कटु हो गई,
अब मेरी ही ध्वनि मुझे परायों सी सुनाई देती है।
सहन करने की भी एक सीमा होती है इस संसार में,
उन्होंने उस अंतिम रेखा को भी पार कर दिया।
तोड़कर मेरे भीतर के उस शांत मनुष्य को,
मुझे वो बनने पर विवश किया, जो मैं कभी था ही नहीं।
किंतु अब मन में कोई शिकायत, कोई रोष नहीं,
न ही नयनों में किसी के लिए कोई पश्चाताप है।
समय के थपेड़ों ने एक गहरी समझ दे दी है,
अब स्वयं से ही बस यही एक सीधा प्रश्न है।
समझ गया हूँ कि हर पीड़ा देने वाला अपना नहीं होता,
दिखावे के नातों का भार अब उठाना छोड़ दिया।
अनिवार्य नहीं कि हर कच्चे सूत्र को जीवन भर खींचा जाए,
मैंने भी अब हर अनजाने संबंध को निभाना छोड़ दिया।

अब मैंने स्वयं को समेटकर आगे बढ़ना सीख लिया है,
झूठे दिलासों की धूप में जलना छोड़ दिया।
अपनी अंतरात्मा की शांति ही अब मेरा गंतव्य है,
दूसरों की कसौटियों पर खुद को बदलना छोड़ दिया।
जो बीत गया वह केवल एक कटु अध्याय था जीवन का,
अब अपनी नई गाथा मैं स्वयं अपने हाथों से लिखूँगा।
भीड़ में खोकर अपनी पहचान गँवाने से अच्छा है,
मैं अकेला ही सही, अपनी सादगी में खिलूँगा।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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