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‘अविराम’ – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
थक चुका है यह तन, पर सांस अभी विस्मित है,
हर पग पर मिल रही, एक नई परीक्षा निश्चित है।
टूटता है जब विश्वास, आँख भी भर आती है,
काँप उठता है यह हृदय, जब आत्मा भी घबराती है।
धैर्य की हर ढाल पर, चोट गहरी लग रही,
समय की इस धूप में, आशा धुंधली पड़ रही।
पर झुका पाया नहीं, कठिनाइयों का यह झंझावात,
एक वेग अभी शेष है, मेरे इस मन के साथ।
हाँ, थकी है आज अंतरात्मा, पर झुका शीश नहीं,
हार मान लूं मैं यूँ ही, यह बात तो सत्य नहीं।
मार्ग चाहे हों कठिन, लक्ष्य को पाना है मुझे,
इस घने अंधकार में भी, दीपक जलाना है मुझे।
स्वयं से है रोष कोई, तो समय से भी विवाद है,
है भाग्य रूठा भले, पर लड़ने का शंखनाद है।
जब तक धमनियों में रक्त है, यह संघर्ष यूँ ही जारी है,
विजय होगी एक दिन, बस इसी की तैयारी है।
काली घनघोर रात है, पर भोर का विश्वास है,
टूटी हुई कड़ियों में भी, जुड़ने की एक आस है।
झुलस रही है यह काया, बाधाओं की अग्नि में,
पर तपना ही तो लिखा है, जीवन की इस रागिनी में।
हाँ, थकी है आज अंतरात्मा, पर झुका शीश नहीं,
हार मान लूं मैं यूँ ही, यह बात तो सत्य नहीं।
मार्ग चाहे हों कठिन, लक्ष्य को पाना है मुझे,
इस घने अंधकार में भी, दीपक जलाना है मुझे।
गिरता हूँ हर बार मगर, फिर उठने की ठानी है,
यह थकावट तो क्षणिक है, मेरी अनंत कहानी है।
पर्वत सी कठिनाइयाँ हैं, पर साहस मेरा लेश नहीं,
जीत कर ही रुकूँगा मैं, इससे कम कुछ स्वीकार नहीं।
स्वयं से है रोष कोई, तो समय से भी विवाद है,
है भाग्य रूठा भले, पर लड़ने का शंखनाद है।
जब तक धमनियों में रक्त है, यह संघर्ष यूँ ही जारी है,
विजय होगी एक दिन, बस इसी की तैयारी है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

