स्याही के पदचिह्न – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
पत्तों पर लिखे संदेशों से, जब बात हवा तक जाती थी,
शासक की कोई आज्ञा लेकर, जब सेना दूर चली जाती थी,
वो आदि रूप था चिट्ठी का, जो इतिहास पुराना कहता है,
शब्दों के इस ताने-बाने में, जीवन का किस्सा रहता है।
फारस की रानी अतोसा ने, पहला पैगाम लिखा होगा,
पपाइरस, छाल और चर्मों पर, जज्बातों का नाम दिया होगा।
मिस्र की उन पाठशालाओं में, ये कला कभी सिखलाई गई,
फिर डाकियों के पाँवों से, हर एक डगर नापी गई।
व्यापारी के व्यापारों से, अपनों के प्यार-दुलारों तक,
ये पत्र सफ़र करते-करते, पहुँचे हैं महलों-द्वारों तक।
कल तक जो स्याही और कागज़, जज़्बात बयां कर जाते थे,
वह दूर देश के अपनों को, पल भर में पास ले आते थे।
अब ईमेल और मैसेज का, आधुनिक नया एक दौर बढ़ा,
पर पत्र-लेखन का गौरव तो, इतिहास के पन्नों में ही रहा।
यह केवल शब्द नहीं होते, यादों की अमिट निशानी है,
मानव के दिल की धड़कन है, सदियों की यही कहानी है।
सहेजकर रखे जाते थे जो, वो प्रेम-पत्र अब छूट गए,
तकनीक की इस आंधी में, वो पुराने धागे टूट गए।
ना अब कोई राह निहारे, ना डाकिए का इंतज़ार रहा,
सवालों के फौरन जवाबों ने, वो धीरज का सुख मार दिया।
पर सरकारी दफ्तर की फाइलों में, यह आज भी न्याय का पहरा है,
दस्तावेजों की दुनिया में, इसका ही सिक्का गहरा है।
कागज़ पर उतरी वो स्याही, इतिहास बदलती आई है,
मानव की इस सभ्यता को, पत्रों ने ही तो सजाई है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया।

