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उमंग की सरिता-जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’

Jainendra

Jainendra prasadRavi

बसंती बयार चली,

खिल गई कली-कली,

*कोयल की आ गई है, फिर तरुणाई है।*

चिड़ियाँ चहक रही, 

डालियाँ लचक रही, 

*बागों में महक रही, खूब अमराई है।*

ऋतुओं में होता खास 

ऋतुराज मधुमास, 

*बहारों ने पराग कू, सुरभि उड़ाई है।*

मौसम का देख रंग, 

मदन भी हुआ दंग,

*प्रकृति ने उमंग की, सरिता बहाई है।*

जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’

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