‘वाणी-संवाद’ – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
सम्’ उपसर्ग व ‘भाषण’ मिले, बने शब्द अनमोल।
सम्यक सुंदर बातचीत, मिश्री जैसे बोल॥
दो या दो से अधिक जन, जब बैठें एक साथ।
भाव विचार विचारें सभी, मौखिक-मौन संवाद॥
केवल बोलना ही नहीं, सुंदर यह विज्ञान।
सुनना, समझना, बोलना, यही मुख्य पहचान॥
द्विमार्गी यह प्रक्रिया, वक्ता-श्रोता संग।
एकतरफा भाषण नहीं, उभय राग के रंग॥
जग के सारे संबंध व, सुंदर कारोबार।
व्यक्तित्व निखारे चेतना, संभाषण आधार॥
कम से कम दो लोग हों, तभी जमेगी बात।
संवादों से ही सजे, जीवन की सौगात॥
व्याख्यान, वाद-विवाद या, सुंदर एकालाप।
मंच संचालन, कमेंट्री, हरें हृदय का ताप ॥
शुद्ध ज्ञान हो भाषा का, शब्द रहें अनुकूल।
मानक सुंदर उच्चारण, महके जैसे फूल॥
धैर्य रहे और स्पष्टता, वाणी में हो वेग।
श्रोता के अनुसार हो, अद्भुत कला-विवेक॥
शारीरिक भाषा सजे, नैन करें संकेत।
सफल संभाषण वही है, जो जीत ले हर क्षेत्र॥
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

