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वसुधैव कुटुम्बकम – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

वसुधैव कुटुम्बकम – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

अयं निजः पर वेति, सोच यह छोटी भाई।
उदार मन के हेतु, धरा परिवार कहाई॥
महोपनिषद का मंत्र, एकता पाठ सिखाए।
बंटे हुए संसार, एक ही सूत्र मिलाए॥
वैश्विक गाँव स्वरूप, आज तकनीक बनाती।
वैचारिक जो दूरी, उसे पर दूर न करती॥
संकट मौसम मार, त्रास आतंकीय भारी।
मिलकर लड़ना आज, सीख यह कहती सारी॥
युद्ध-तनाव विनाश, न सुख कोई भी पाए।
बातचीत सौहार्द, शांति का मार्ग दिखाए॥
भारत का यह धर्म, विश्व ने सदा सराहा।
संकट में हर देश, मित्र बन साथ निबाहा॥
अतिथि देवो भव मान, हृदय से गले लगाया।
शरण आए जो द्वार, उन्हें निज बंधु बनाया॥
जी-ट्वेंटी का मंच, एक सुर यही सुनाए।
एक धरा परिवार, एक भविष्य बनाए॥
जाति रंग का भेद, भाव संकुचित मिटाए।
पशु-पक्षी पर्यावरण, मित्र सम प्रेम बढ़ाए॥
कण-कण में करुणा जगा, चेतना उच्च बनाती।
मानव का कल्याण, यही पावन मति लाती॥
विविध फूल से आज, बाग जैसे मुस्काता।
विविधता का मेल, धरा को स्वर्ग बनाता॥
ढहा नफ़रत की भीत, सुदृढ़ नव नींव बनाएँ।
आने वाली नस्ल, शांति का अनुपम पाएँ॥

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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