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विवेक का विसर्जन – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

विवेक का विसर्जन – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

 

शांत चेतना के सागर में,

उठता एक बवंडर है,

दिखता है जो छोटा सा,

पर महाविनाशक भँवर है।

क्रोध एक भँवर है, गुरुदेव,

यह सचमुच एक भँवर है!

जब यह आता, खींच ले जाता,

ज्ञान, विवेक और मन की शांति,

पल भर में सब निगल है जाता,

फैलाता अंधियारी भ्रांति।

दूब समेटे अपनी बाहें,

बुद्धि डूबती इसके अंदर है,

क्रोध एक भँवर है, गुरुदेव,

यह सचमुच एक भँवर है!

बाहर रौद्र रूप दिखलाता,

भीतर से खोखला बनाता,

औरों का नुकसान करे क्या,

खुद की ही बस्ती जलाता।

जल का वेग नष्ट कर देता,

जिसकी गोदी में यह घर है,

क्रोध एक भँवर है, गुरुदेव,

यह सचमुच एक भँवर है!

तैरने वाला हाथ-पैर मारे,

तो और गहराई में जाता,

इस भँवर को जीतने का बस,

एक ही गुरुमंत्र काम आता—

शांत हो जाओ, साक्षी बन जाओ,

मौन ही इसका सच्चा उत्तर है।

क्रोध एक भँवर है, गुरुदेव,

यह सचमुच एक भँवर है!

सांसों की पतवार थाम कर,

जो तटस्थ हो रुक जाता है,

वही धीर, वही गंभीर पुरुष,

इस भँवर को जीत पाता है।

मन बन जाए शांत सरोवर,

यही साधना सबसे सुंदर है।

क्रोध एक भँवर है, गुरुदेव,

यह सचमुच एक भँवर है!

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

रानीगंज अररिया

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