वृक्ष है जीवन हमारा, क्यों किया इसका विनाश।
कर रहे हो फिर भला क्यों, शुद्ध संचारी तलाश।।
ताप जब बढ़ता धरा का, भूल आती याद सर्व।
थें यही अपनी धरा पर, पूर्व धारे खास गर्व।।
हो विरानी आज धरती, कर रही सबको निराश।
वृक्ष है जीवन हमारा, क्यों किया इसका विनाश।।०१।।
काट जंगल को हमीं ने, दंश ली स्वीकार आज।
नित्य पैमाने नवल ले, कर रहे सम्पूर्ण काज।।
जाल में ऐसे फंँसे जो, हो रहे नित ही हताश।
वृक्ष है जीवन हमारा, क्यों किया इसका विनाश।।०२।।
छोड़कर अब बात सारी, तरु लगाए नित्य खूब।
श्यामली धरती हरी कर, चैन सरिता नीर डूब।।
त्यागना होगा हमें अब, आधुनिक यह मोहपाश।
वृक्ष है जीवन हमारा, क्यों किया इसका विनाश।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८
0 Likes

