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अंतर्यात्रा’ – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

अंतर्यात्रा’ – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

 

शांत चित्त, मौन मन, जब परम सत्य में खोता है,

द्वैत भाव का अंत वहीं, आनंद अनूठा होता है।

सुख-दुख, लाभ और हानि की, हर सीमा पीछे छूट गई,

मैं और पराए की दीवार, पल भर में जैसे टूट गई।

अष्टांग मार्ग की सीढ़ी पर, जब साधक कदम बढ़ाता है:

यम-नियम के पालन से, जीवन पावन बन जाता है।

आसन से काया स्थिर हुई, प्राणायाम से श्वास थमी,

प्रत्याहार जगा भीतर, जब अंतर्मुखी हुई हर रश्मि।

धारणा ने दी एकाग्रता, ध्यान निरंतर बहने लगा,

समाधि की उस पावन अवस्था में, कोई ‘अहं’ न रहने लगा।

ध्याता, ध्यान और ध्येय यहाँ, मिलकर सब एक हो जाते हैं,

शुद्ध चेतना के सागर में, सब जीव मुक्ति पा जाते हैं।

अभ्यास और ध्यान के मार्ग कई, जो भीतर हमें ले जाते हैं

आती-जाती श्वासों पर, जो तटस्थ पहरा बिठाते हैं।

मंत्रों के जप की गूंज जहाँ, मन के विकारों को धोती है,

“मैं कौन हूँ?” की व्याकुलता, आत्म-बोध को बोती है।

विचारों को बस बहते देखना, बनकर एक साक्षी न्यारा,

मुक्ति का यही तो मार्ग है, अध्यात्म का अमृत-धारा।

मौन चित्त की पावन बेला, जब अंतर में उजाला होता है,

मिट जाता है सब ‘मैं’ और ‘मेरा’, जब जीव ब्रह्म में खोता है।

न सुख की चाह, न दुख का भय, न लाभ-हानि की चिंता है,

द्वैत भाव का अंत जहाँ, वहीं शुद्ध चेतना जगता है।

मन, वचन और कर्म से, जीवों पर करुणा बरसाना।

वाणी में हो निश्छलता, जीवन को सरल बनाना।

चोरी की चाह न रखना, जो मिला उसी में मुस्काना।

ऊर्जा का संयम करके, दिव्य चेतना को पाना।

वस्तुओं का संचय तजकर, निर्मल जीवन अपनाना।

 

भीतर-बाहर की स्वच्छता, मन को पावन कर देती है।

तृप्ति की चादर ओढ़े, यह शांति हृदय में भरती है।

द्वंद्वों को सहने की शक्ति, संकल्प जगाती है तन में।

ग्रंथों का चिंतन-मनन, ज्ञान जगाता है मन में।

समर्पण ईश्वर के चरणों में, अहंकार को हरती है।

स्थिर और सुखद हो मुद्रा, काया का चंचलपन थमे।

रीढ़ सीधी, तन शांत रहे, ऊर्जा का संचार रमे।

आती-जाती श्वासों की गति पर, जब पहरा लग जाता है।

प्राण-अपान का होकर मिलन, मन भीतर ही ठहर जाता है।

रूप, रंग और शब्दों से, जब इंद्रियाँ पीछे हटती हैं।

कछुए की तरह समेट खुद को, भीतर की ओर वो मुड़ती हैं।

किसी मंत्र, बिंदु या मूरत पर, जब चंचल मन टिक जाता है।

भटकन सारी थम जाती है, संकल्प सुदृढ़ हो जाता है।

तैलधारा वत् एकाग्रता, जब बिना रुके बहती जाए।

ध्याता और ध्येय के बीच में, कोई बाधा न आने पाए।

ध्याता, ध्यान और ध्येय यहाँ, मिलकर सब एक हो जाते हैं।

मिट जाती है ‘मैं’ की हस्ती, बूंद और सागर मिल जाते हैं।

अंतर-साधना के अन्य अनुपम मार्ग

आती-जाती श्वासों को बस, चुपचाप देखते रहना है।

बिना किसी विचार के, केवल सजगता में बहना है।

पवित्र नाम की गूंज जहाँ, मन के विकारों को धोती है।

हर एक सांस में नाम बसे, आत्मा दिव्य रस में रोती है।

“मैं कौन हूँ?” इस गहरे प्रश्न से, खुद का पर्दा हटाना है।

तन, मन और बुद्धि से परे, जो सत्य है, उसे पाना है।

सुख आए या दुख आए, विचारों का मेला लगा रहे।

हम बस देखें एक गवाह बनकर, भीतर का दीप जगा रहे।

यह अष्टांग की पावन गंगा, अध्यात्म का अमृत-धारा है,

जिसने भी डुबकी लगाई इसमें, उसने खुद को ही तारा है।

 

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

रानीगंज अररिया 

23.10.2026

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