Site icon पद्यपंकज

ब्रह्मचारिणी रूप – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

RAMPAL SINGH ANJAN

RAMPAL SINGH ANJAN

ब्रह्मचारिणी रूप – रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’

शिखर हिमालय से भी ऊँचा, माता तुमको पाऊँ मैं।
दिव्य लोक के सिंहासन पर, देख-देख इठलाऊंँ मैं।।

ब्रह्मचारिणी बिना सवारी, नंगे पाँव निराली हो।
लाई दुनिया खाली झोली, पूरी भरने वाली हो।।
मेरी भी झोली भर जाए, तुझ पर शीश झुकाऊँ मैं।।
दिव्य लोक के सिंहासन पर, देख-देख इठलाऊंँ मैं।।

रोली अक्षत कुमकुम चंदन, आभासित मधुमय आपस।
फूल चमेली श्वेताम्बर हैं, त्याग रहे अपने तामस।।
ज्ञान बैराग्य तप संयम की, सरसी में नहलाऊँ मैं।।
दिव्य लोक के सिंहासन पर, देख-देख इठलाऊंँ मैं।।

घी के दीपक भाव भरे शुभ, श्रद्धाबल उत्सर्ग करे।
लाल सिंदूर ओढ़े लाली, क्षितिज लाल संसर्ग करे।।
अपलक आँखें खोल निहारूँ, पुण्य-लोक में जाऊँ मैं।।
दिव्य लोक के सिंहासन पर, देख-देख इठलाऊंँ मैं।।

जपमाला दाएँ कर सोहे, हस्त कमंडल वाएँ साजे।
शांत सौम्य तपस्विनी मुद्रा, भक्त हृदय पर सदा बिराजे।।
पावन सौरभ अनुपम छवि को, उर में नित्य बसाऊँ मैं।।
दिव्य लोक के सिंहासन पर, देख-देख इठलाऊंँ मैं।।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
द्वितीयायै रूपाय नमः
सेवानिवृत शिक्षक, मध्य विद्यालय दरवेभदौर
ग्राम पोस्ट थाना भदौर जिला पटना

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version