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चेहरों का मेला(भ्रम):-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

चेहरों का मेला(भ्रम):-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

घृणा नहीं है किसी से, न कोई शिकायत है,

बस इस स्वार्थी संसार की एक नई वास्तविकता है।

अब किसी अपरिचित का मुस्कुराना भी अच्छा नहीं लगता,

इस झूठे नगर में कोई अपना सच्चा नहीं लगता।

यहाँ मुखड़ों पर सजे हैं मुखौटे कई,

बातों में छुपे हैं गहरे स्वार्थ कई।

जिन्हें माना था हृदय के सबसे निकट,

वो भी बदल गए बनकर भाग्य का संकट।

झूठे वचनों का यह मेला अब सच्चा नहीं लगता,

अब कोई कितना भी संवर जाए, अच्छा नहीं लगता।

देखे हैं मैंने बहुत निकट से बदलते हुए लोग,

जैसे समय के साथ बदल जाता है ऋतु का रुख।

जो कल तक कहते थे साथ निभाएंगे सदा,

आज उनके ही चरणों के चिह्न हैं धुंधले पड़ गए।

अब किसी का साथ जीवन भर का पक्का नहीं लगता,

संबंधों का यह टूटता धागा अब सच्चा नहीं लगता।

चलो अच्छा हुआ कि यह भ्रम भी टूट गया,

जो पराया था, वह मार्ग में पीछे छूट गया।

अब स्वयं से ही स्वयं का नाता निभाना है,

इस स्वार्थी संसार को विदा कह जाना है।

अब तो एकांत की अभ्यास सी हो गई है,

इस मौन से भी एक प्रीति सी हो गई है।

भीड़ में रहकर भी स्वयं को अकेला ही पाते हैं,

अब तो झूठी सभाओं से हम कतराते हैं।

सीख लिया है मैंने अब अकेले ही मुस्कुराना,

बहुत देख लिया इस संसार का रूठना और मनाना।

अब किसी की झूठी सांत्वना का सहारा नहीं चाहिए,

जो डूबता हो मेरा ही हृदय, तो मुझे कोई तट नहीं चाहिए।

अब स्वयं ही अपनी नैया के यात्री बनेंगे,

इस स्वार्थी युग से बहुत दूर जाकर रहेंगे।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

प्राथमिक विद्यालय रेही टोल

रानीगंज अररिया 

16-10-2026

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