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चेतना का शंखनाद – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

चेतना का शंखनाद – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
क्यों आवश्यकता आन पड़ी, इस बालिका दिवस को मनाने की?
ये जान लेना सब भाई, रीति बदलने इस ज़माने की।
यह सामाजिक चेतना का, कुरीतियों पर प्रहार है,
जब उठ खड़ी होगी बाला, तभी सुरक्षित संसार है।

बेटे की चाहत में सदियों, कोख यहाँ जो उजड़ती रही,
पैदा होते ही कली ज़मीं पर, घुट-घुट कर जो मरती रही।
बंदिश की भारी बेड़ियों ने, जिसका पग-पग घेरा था,
उसी भयानक रात को चीरने, आया यह सवेरा था।
क्यों आवश्यकता आन पड़ी…
यह दिवस नहीं कोई उत्सव है, यह रूढ़िवाद पर एक चोट है,
जो रोके बेटियों के पर को, उस ओछी सोच की खोट है।
हर बाला अब दुर्गा बनकर, अन्याय से टकराएगी,
पढ़-लिखकर अपने अधिकारों का, वह परचम लहराएगी।
क्यों आवश्यकता आन पड़ी…
जागो ओ समाज के रखवालों, अब और न इन्हें संताप दो,
बेटे सा ही अधिकार इन्हें, खुलकर उड़ने का आकाश दो।
सृष्टि का आधार है बेटी, इस आँगन का अभिमान है,
जब मुस्कुराएगी घर की लक्ष्मी, तभी बढ़ेगा देश का मान है।
कुरीतियों के बंधनों को, मिलकर आज मरोड़ना होगा,
हर बाला के कोमल हाथों को, प्रगति-पथ से जोड़ना होगा।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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