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दीप पर्व का शाश्वत सत्य-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

कार्तिक की वह सघन अमावस, अज्ञान का छाया था डेरा,

पर यम के द्वारे चमक रहा था, नचिकेता का बाल-सवेरा।

पितृ-आज्ञा सिर माथे धरकर, बालक यमलोक में आया,

तीन दिवस तक भूखा-प्यासा, मुख्य द्वार पर आसन लगाया।

लौट यमराज जब आए, व्याकुल हो उठा देव का मन,

बालक के धीरज को देख, अर्पण किए तीन वरदान अनुपम।

मांग प्रथम और द्वितीय वर में, पिता-कृपा और स्वर्ग की माया,

तृतीय वर में नचिकेता ने, मृत्यु का ही रहस्य उठाया।

“हे यमराज! मुझे बतलाओ, देह त्याग जब जीव है जाता,

क्या सब कुछ मिट जाता है, या कोई अंश शेष रह जाता?”

प्रलोभन दिए यमराज ने लाख, पर बालक तनिक न डोला,

“नश्वर हैं ये वैभव सारे, मुझे शाश्वत सत्य दो,” वह बोला।

देख पात्रता उस बालक की, मृत्यु के स्वामी मुस्काए,

अमावस की उस काल-रात्रि में, ब्रह्मज्ञान के दीप जलाए।

कहा—”नश्वर है यह चोला, पर आत्मा अजर-अमर अविनाशी,

जो जान ले खुद के भीतर का प्रकाश, वही है सत्य का वासी।”

मृत्यु पर पाकर विजय अमर, जब नचिकेता भू पर आए,

अज्ञान के घोर तिमिर को तजकर, जग ने दीप मालिका सजाए।

वही रोशनी आज तलक, दीपावली बनकर जगमगाती है,

बाहर के दीयों के संग, भीतर का दीप जलाना सिखाती है।

                      धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

                प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

                        रानीगंज अररिया 

                                       

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